Sunday, 30 June 2019

इंद्र देवता की कृपा भी क्या कमाल करतें हैंकहीं झमाझम बारिष कही सूखे खेत रोते हैं।

आज की बारिश में.......
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किसी चेहरे पर खुशी
किसी चेहरे पर उदासी
आज की बारिष में ........

किसी की छत चू रही होंगी
किसी आँगन में पानी का पोखर
मायूस सी गृहणी सोचती होगी
रोटी सीकेगी कैसे तवे पर

आज की बारिष में......

कपड़े सारे  भीग गये होंगे
ईन्हंन भी गीले हो चुके होंगे
कैसे मारूं फूंक इनपर
की धुवें से दम घुटने लगेंगे

आज की बारिश में.....

फिर भी मन न जाने क्यों खुश है
धान के बीज रोपा था जो खेत में
चलूं उनको ही देख कर खुश होतें हैं
अन्न की अच्छी पैदावर होगी खेत में

आज की बारिश में....

दाता! ये कैसा न्याय है तेरा
कभी सूखा कभी सैलाब लेआता
कभी गांव के गाँव हैं उजड़ते
कही पानी कों तरसता इंसान तेरा!

आज की बारिष में....

        🌷उर्मिला सिंह


Saturday, 29 June 2019

भले ही नारी उचाईयों को छू ले पर हर कदम पर बंदिशों का सामना करना पड़ता है ,ईसी भाव को शब्दों में ढाल कर पन्नों पर बिखेर दिया है।

एक कहानी .....जिन्दगी की....

            जिन्दगी , जो पतंग की तरह नीले आकाश में उड़ती है ,छूना चाहती है अम्बर को , पर डोर तो किसी और के हाथ में होती है , जितनी ढील मिलती है पतंग उसी हिसाब से उड़ती है  ।
               आज न जाने क्यों मन सोचने लगा कि  सारी बंदिशें नारी के ही लिये क्यों? क्या पुरुष को अनुशासन, संस्कारों की जरूरत नही पड़ती। उनके ह्रदय की संवेदनाओं को जगाना जरूरी नही होता । इन्ही बातों के उधेड़ बुन में बैठी थी कि मेरी एक बचपन की सहेली का फोन आया " आ जाओ आज मेरे यहाँ शाम की चाय एक साथ पीतेें हैं" । विचारों को वहीं स्थगित कर के मैं अपनी सहेली के यहाँ पहुंची, वहाँ मेरी सहेली कुछ मायूस सी लगी।  आगे बढ़ कर मैंने उसे गले लगाया तथा पूछा"कैसी हो आज ये खिलता चेहरा मुर्झाया सा क्यों है" । हल्की सी
मुस्कान की एक पतली रेखा उसके अधरों पर खिंच गई।
              मुझे समझने में देर नही लगी कि  कुछ तो गड़बड़ है। बात आगे बढ़ाने के लिये मैंने कहा ,"सुषमा चाय पिला यार फिर आराम से बात करतें हैं"। कुछ देर हम दोनों शांत बैठे रहे तभी चाय और गरमागरम पकोड़े भी आगये....
फिर क्या था हम दोनों चाय की चुस्कियों के साथ बातें करने लग गये । बातों का सिलसिला कुछ ऐसा चला कि समय का पता ही नही चला ।
               तभी उसकी बेटी बाहर से आई ....! उसे देखते ही सुषमा बिफर पड़ी  "इतनी देर क्यो ? नित्य तुम कुछ न कुछ बहाना बनाती हो , कभी ट्यूशन, कभी ट्रेनिंग आखिर करती क्या हो ,लड़कियों का इतना घूमना अच्छा नही होता तुम्हे दूसरे के घर जाना है इत्यादि इत्यादि.."..। मैं आवाक कभी उसे कभी उसकी लड़की को देखती रही  । अन्त में मुझसे रहा नही गया मैने पूछ ही लिया " सुषमा! ...यही पश्न तुमने अपने लड़के से कभी पूछा ?शायद नही" .....उसने तपाक से उत्तर दिया "वह तो लड़का है कौन दूसरे के घर जाना है"...
            
            आश्चर्य चकित मत होइए ये घर - घर की कहानी है
आज भी कितने घरों में यह सोच पल्लवित पुष्पित हो रही है। सुषमा की लड़की पर्स बैग ऐसे ही समानों का बिजनेस करती है  फिर भी उसपर अंकुश  और बेटा पढ़ रहा है पर स्वतंत्र । उसे मैंने समझाया और कहा की लड़की को उसकी जिन्दगी जीने दो उसके पर मत काटो उड़ान भरने दो......।
सुषमा से गले मिलते हुवे मैं सोचती रही ..........

               नारी बंदिशों में कब तक जीती रहेगी -- कभी  माँ बाप ने बन्दिशों का संस्कार नाम दे दिया-- कभी सास ससुर ने परम्पराओं एवम अनुशासन के नाम पर जंजीरों में जकड़ दिया , पतिदेव ने अपनी इक्छाओं , सपनो को समर्पित कर
वफ़ा का नाम दिया , बच्चे उससे भी दो कदम आगे नई एवम पुरानी सोच का अन्तर बता दिया। मैं सोच में ठगी ठगी सी नारी को महसूस करती रही।
             क्या विडम्बना है , .... ! जिन्दगी हमारी ,पर हमारी हर साँस पर दूसरों का कब्जा और हमने इन्ही सांसों को जिन्दगी का नाम दे दिया ..........
             आखिर क्यों......क्यों.......
            
                                                 🌷उर्मिला सिंह         

Friday, 28 June 2019

वर्षा की मीठी फुहारों को देख कृषक मन झूम उठा अब अन्न से घर भरेगा ,सोचे हुवे सपने साकार होंगे....

बरखा रानी झूम के बरसो......
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छमछम बरसे मेघा मिटी धरा की प्यास! 
हर्षित मन किसान का छेड़े मोहक तान !!                                         

अन्नदाता आस लगावे जोड़े प्रभु का हाथ
अबकी अन्न भरो दाता घर आँगन की शान

पिछले कर्ज चुकाय बेटी का करूँ विवाह
धनिया को खरीद सकूँ धानी चुनर इस बार!!

ताल तलैया भर उठे धुले धुले हर पात!
नदिया यौवन गर्विता चली सजन के पास!!

बारिष में बच्चे खेल रहे छपाक छपाक!
जलकी रानी इतराय रही जल की देख बहार!!

नारी मन विह्वल हुवा महकी सावनी बयार!
पायल चूड़ी कंगना खनकें,झूमे झूले से डार!!

बिरही नैना सोच रहे कब आवेंगे पिय मोर!
रात अँधेरी दामिन चमके रहि रहि देखूं द्वार!!
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                                       🌷उर्मिल सिंह       








Wednesday, 26 June 2019

जिन्दगी और...... ख्वाइशें.....

जिन्दगी ख्वाइशों से ही चलती है नही तो थम जाती है।

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उम्र भर सफ़र में ही रही जिन्दगी.....
रास्ते खत्म होतें हैं कहाँ....
ख्वाइशों का कारवां रुकता नही
मंजिल पाएं कैसे... कहाँ....
पर ख्वाइशें हैं जिद्दी !!
खत्म होने का नाम नही लेती
थम जाय तो जिन्दगी.......
पूर्ण विराम पाजाती.....!!
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         🌷उर्मिला सिंह

Tuesday, 25 June 2019

ख़ुदा जाने.....

आज न श्रद्धा रही न चरित्र रहा और न ज्ञान कहने का अर्थ यह नही कि लोग अज्ञानी हैं परन्तु आज ज्ञान रहने के उपरांत भी चरित्र की कमी के कारण ज्ञान अज्ञान में बदल जाता है। इसी को इंगित करती रचना .....
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कब्र में पावँ हैं जिनके,हसरतें मचल रही है
अंजाम क्या होगा उनका ख़ुदा जाने ।

हर तार दिल का जख्मी है यहाँ ,वीणा वादनी
ताल सुर में गीत कैसे निकले,ख़ुदा जाने।

हर रोज सूरज निकलता कोरे पन्नों के संग है
नफ़रतों के दौर में मोहब्बत कैसे लिखे ख़ुदा जाने।

ढलती शाम में,आफताब मायूस होने लगा
बहाये चाँदनी आंसू ,शब गुलजार कैसे होखुदा जाने।

चरित्र नाव, ज्ञान पतवार,भवसागर पार करने की
भूल बैठा इसी को इंसान सागर पर कैसे हो खुदा जाने।
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              🌷उर्मिला सिंह

प्रिय तुम जो आजाओ.......

नारी प्रेम समर्पण की प्रतिमूर्ति होती है उन भावों को छलकाती मेरी रचना........
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कंचन कलश सजाऊँ
आँगन ड्योढ़ी अल्पना उकेरू
भावों के प्रसून चुन
प्रीत के धागों में बाँधू
प्रिय!  तुम जो आ जाओ.......!!

रजनी गन्धा की खुशबू सी
महकू ,बहकूँ दीवानी सी
छलकाऊँ नेह गंग अविरल
नयनन आंजू प्रीत का काजल
प्रिय!  तुम जो आ जाओ.......!!

करेगी पायल मेरी झनकार
लहराये गी चूनर बारम्बार
खनकेगाा हाथ का कंगन
जलेगा मंगल दीप आँगन
प्रिय!  तुम जो आ जाओ........!!

ये बन्धन युगों - युगों का
प्रेम साश्वत जीवन का
साँसों में  घुल  मिल  जायेगा
विकल प्राण नव गान सुनायेगा
प्रिय!  तुम जो आ जाओ......!!
     
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                       🌷उर्मिला सिंह