मन,विचार का मिलन जब कलम से होता है तब कलम पन्नों से कुछ गुफ़्तगू करने के लिए मचल पड़ती है.......
मन सोचा करता है.....कभी कभी
क्या पाया क्या खोया जग में
अपनो के आंखों में प्यार का गहरा सागर
मन खोजा करता है कभी कभी।।
अधरों पर प्रीत की मीठी मुस्कान
वाणी में मर्यादा और सम्मान
अपनो का अपनापन अब कहाँ
सब अतीत की बातें लगती हैं यहां।।
मन सोचा करता है कभी कभी ।
जो दिल को नज़र आता था सदा.....
वो खूबसूरतअनुभूति नही मिलती
सरलता सादगी कोसों दूर हुई
भावों को समझे जो ऐसा मीत नही मिलता।।
मन सोचा करता है कभी कभी।
चाहत के उपवन की भीनी भीनी सुगन्ध
रिश्तों की पनपती शाखाएं
और हसरतों के फूल घनेरे
सब मुरझाए,मुरझाये से लगते हैं
सुख की जाने क्यों अनुभूति नही होती।।
मन सोचा करता है कभी कभी।
जीवन दर्पण में भिन्न भिन्न चेहरे दिखते
अधूरी मुस्कान अधूरी बातें
अधूरे आँसूं अधुरे सपने
अपनेपन की ढहती दीवारें
प्यार,स्नेह के मोती की माला बिखरी बिखरी
मन सोचा करता है कभी कभी।
पाश्चात्य सभ्यता दोषी या संस्कार हैं दोषी
नए जमाने की चकचौन्ध
या कलयुग का आगमन
क्योंअनुराग सरिता जलविहीन हुई
धड़कन को क्यों प्यार समझने में भूल हुई
मन सोचा करता है कभी कभी
उर्मिला सिंह