सागर लहरें
Saturday, 17 November 2018
गाँवों की जिंदगी
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मजबूरियों के जाल में फंसी हुई है गांवों की जिन्दगी पश्ननों के भँवर में उलझी आज भी गाँवों कि जिन्दगी खुशियाँ मिली जिनकी बदौलत भूल जातें है ...
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Thursday, 15 November 2018
मुक्तक
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गरीबी..... हम गरीबों की भी अजब जिंदगानी है दफ़्न होती निशदिन अस्मत हमारी है कौन समझे पीर ज़ख्मी दिल की यहाँ रोटी का टुकड़ा दीवाली होली हमार...
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Friday, 12 October 2018
गरीबी की व्यथा......
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गरीबी की मौन व्यथा बच्चों के आँखो से झलकती है........ *****0****** नवरात्रि आते ही आँखें चमकने लगी, हमारी भी पूजा होगी...
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Thursday, 11 October 2018
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छत से छत जब अलग होने लगी दिलों में दूरियाँ तभी से बढ़ने लगी! प्यार की छत को तरसता आदमी, प्यार में भी अब मिलावट होने लगी! ...
तन्हाइयाँ...
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जब से तन्हाइयों में जीने का सलीका आगया , तब से खुद को पहचानने का तरीका आगया!! खामोश लबों की भी अपनी कहानी होती है जिन्दगी जीने कि येअदा भ...
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संवेदना...
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आज के युग में सम्वेदनाओं का आभाव होगया है इसी भाव को दर्शाती रचना...... ****0**** सम्वेदनाओं के शब्द से दिल पिघल जा...
Sunday, 7 October 2018
वो दिन कभी तो आयेगा.....
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समाज की व्यवस्था से दुखी मन कराह उठता है नित्य मर्यादाओं का उलंघन,राजनीति का गिरता स्तर वाणी में मधुरता का आभाव जाने कहाँ जारहें हैं हम। *...
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