बचपन की यादें उम्र की झुर्रियों तले छुप गई
हम देखते रहें जिन्दगी अपना वजीर चल गई
गिरती दीवारों को सम्हालता कौन है
कँपकपाते हाँथो कोें थामता कौन है
जिन्दगी अच्छी गुजरी,किश्मत की बात है
दर्द में जो गुजरी साहिब कर्मों की बात है!
बचपन की यादें उम्र की झुर्रियों तले छुप गई
हम देखते रहें जिन्दगी अपना वजीर चल गई
गिरती दीवारों को सम्हालता कौन है
कँपकपाते हाँथो कोें थामता कौन है
जिन्दगी अच्छी गुजरी,किश्मत की बात है
दर्द में जो गुजरी साहिब कर्मों की बात है!
जिधर देखो उधर हंगामा.....ही हंगामा
कलियों को देख भौरों में .....हंगामा
रंगों की बौछार आई ...दिलों में ..... हंगामा.....
दुकानों में अबीर गुलाल पिचकारियों का हंगामा
जिधर देखो उधर हंगामा ही ......हंगामा
शादी में बरातियों के जाम का हंगामा
लड़के वालों के मन में दहेज का हंगामा
दूल्हे के दिल में छलकते प्यार का हंगामा
दुल्हन के ह्रदय में बिछुड़ने का हंगामा।।
जिधर देखो उधर हंगामा ही.....हंगामा।
घर में अधिकारों पर सास बहू में हंगामा
पति पत्नी में अहम के टकराव का हंगामा
नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी में विचारों का हंगामा
पास पड़ोस दोस्तों में आगे बढने का हंगामा।।
जिधर देखो उधर हंगामा ही.......हंगामा।
राजनीति गलियारे में कुविचारों का हंगामा
संसद में मारपीट करते सांसदों का हंगामा
मचा है सृष्टि में
जनता में महंगाई बिजली पानी का हंगामा
नेताओं ,दलों में सत्ता हथियाने का हंगामा
गरीबी,बेकारी दूर खड़ी देख रही निःशब्द
वोट किसे देना होगा मचा है मन में हंगामा।।
जिधर देखो उधर हंगामा ही..... हंगामा।
उर्मिला सिंह
हमदर्द.... ..
अश्कों को हमदर्द बना
दर्द गले लगातें हैं
मुझसे मत पूछो दुनिया वालों
अधरों पर मुस्काने
किस तरह सजातें हैं।।
फूलों की चाहत में
काटों को भूल गए
आहों ने जब याद दिलाया
सन्नाटों से समझौता कर बैठे।।
सन्देह के घेरे में जज्बात रहे
लम्हे अपने,अपने न रहे
फरियादी फरियाद करे किससे
जब कातिल ही जज की ......
कुर्सी पर आसीन रहे....
लफ्जों में पिरोतें हैं
एहसासों के मोती
संकरी दिल की गलियों में
कौन लगाता कीमत इनकी।।
निद्र वाटिका में
अभिलाषाएं मचलती
जीवन से जीवन की दूरी
दूर नही कर पाती हैं....
फिर भी देहरी पर
उम्मीदों के दीप जलाती है।।
उर्मिला सिंह
सुस्त कदम मेरे....
🌺🌺🌺
चलते चलते,....
रुक जाते ....
एक मोड पर ये
थके थके, रुके रुके
अलसाए ...
सोचों में हैं खोए
कौन डगर जाऊं
कुछ समझ न पाए
ये सुस्त कदम मेरे।
पांवों की सुस्ती
दिल दिमाग पर छाती
हर राह यहां अब
लगती है बेगानी
जर्जर नैया
डोल रही
भव सागर में
ना कोई खेवैया
सोच में डूबी
नश्वर काया ....
तेरा मेरा बहुत किया
क्या पाया क्या खोया
इस जग से
सिर धुन धुन पछताता क्यों
सुस्त थके ...कदम मेरे....
उर्मिला सिंह
कौन कहता है कि भगवान नहीं होता?
जब कोई नज़र नहीं आता
तो भगवान नजर आता है
खुदबख़ुद नजरें आसमां पर उठ जाती हैं
एक विश्वास एक भरोसा मन में जग जाता है।
कौन कहता है कि भगवान नहीं होता?
जब कोई नज़र नहीं आता
तो भगवान नजर आता है
खुदबख़ुद नजरें आसमां पर उठ जाती हैं
एक विश्वास एक भरोसा मन में जग जाता है।
नींद.... में भटकता मन.....
*****0*****0*****
नींद में भटकता मन
चल पड़ा रात में,
ढ़ूढ़ने सड़क पर.....
खोए हुए .....
अपने अधूरे सपन...
परन्तु ये सड़क तो....
गाड़ी आटो के चीखों से
आदमियों की बेशुमार भीड़ से
बलत्कृत आत्माओं के
क्रन्दन की पीड़ा लिए
अविरल चली जा रही
बिना रुके बिना झुके l
लाचार सा मन
भीड़ में प्रविष्ट हुआ
रात के फुटपाथ पर
सुर्ख लाल धब्बे
इधर उधर थे पड़े
कहीं टैक्सियों के अंदर
खून से सने गद्दे
लहुलुहान हुआ मन
खोजती रही उनींदी आंखे
खोजता रहा बिचारा मन
आखिरकार लौट आया
चीख और ठहाकों के मध्य
यह सोच कर कि......
सभ्य समाज के
पांव के नीचे.....
किसी की कुचली......
इच्छाओं के ढेर में....
दब कर निर्जीव सा
दम तोड़ दिया होगा
खोया हुआ मेरा.....
अधुरा सपन........
*****0*****0****
उर्मिला सिंह
नींद.... में भटकता मन.....
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नींद में भटकता मन
चल पड़ा रात में,
ढ़ूढ़ने सड़क पर.....
खोए हुए .....
अपने अधूरे सपन...
परन्तु ये सड़क तो....
गाड़ी आटो के चीखों से
आदमियों की बेशुमार भीड़ से
बलत्कृत आत्माओं के
क्रन्दन की पीड़ा लिए
अविरल चली जा रही
बिना रुके बिना झुके l
लाचार सा मन
भीड़ में प्रविष्ट हुआ
रात के फुटपाथ पर
सुर्ख लाल धब्बे
इधर उधर थे पड़े
कहीं टैक्सियों के अंदर
खून से सने गद्दे
लहुलुहान हुआ मन
खोजती रही उनींदी आंखे
खोजता रहा बिचारा मन
आखिरकार लौट आया
चीख और ठहाकों के मध्य
यह सोच कर कि......
सभ्य समाज के
पांव के नीचे.....
किसी की कुचली......
इच्छाओं के ढेर में....
दब कर निर्जीव सा
दम तोड़ दिया होगा
खोया हुआ मेरा.....
अधुरा सपन........
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उर्मिला सिंह
बिखरी जिंदगी......
************
दिल टूटता गया
हम बिखरते गए
सम्हलने की कोशिश में
हर बार शिकस्त खाते गए
लहूलुहान कदम
चलते रहे दर्द चुभते रहे
अधर मुस्कुराते रहे
तन्हाइयों से अश्क ...
गुफ्तगू करते.....
बिखरी जिंदगी को ....
समेटने की कोशिश
फिर वहीं....
उदासी के लिबास में
लिपटी मेरी मुस्कान
न शिकवा न शिकायत
मेरी बिखरी जिन्दगी को
हौसला देते, बस हौसला देते
हम खामोश,निर्विकार
🌷उर्मिला सिंह🌷
हृदय में क्रंदन उर ज्वाला,जीवन गीत लिखूं कैसे
अश्कों के सजल रथ में, मोम से ख्वाब पिघलते
व्यथा की पीर दिशाओं में हवाओं के संग भटकते
बिखरे स्वप्न फूलों से,मन अंचल में छुपाऊं कैसे?
हृदय में क्रंदन उर ज्वाला,जीवन गीत लिखूं कैसे
भावों के गीत मनोरम सब जीवन से लुप्त हुए
आहों की सरगम में जीवन के दिन रात व्यतीत हुए।
आरोह,अवरोह,पकड़ सब भूल गया विकल मन.... भव सागर के लहरों से जीवन नैया पार करूं कैसे।
हृदय क्रंदन उर ज्वाला जीवन गीत लिखूं कैसे...
स्वर खोया शून्य में,अग्नि में समर्पित तन
उड़ती चिंगारियों के बाद बचेगी थोड़ी भस्म
सजल दृगो की करुण कहानी..गंगा में प्रवाहित
वेदना कणों की समर्पण के गीत लिखूं कैसे।
हृदय क्रंदन उर ज्वाला जीवन गीत लिखूं कैसे....।
उर्मिला सिंह
प्रार्थना का मूल रूप.....
*****0*****
प्रार्थना जितनी गहरी होगी
उतनी ही निःशब्द होगी
कहना चाहोगे बहुत कुछ
कह ना पाओगे कभी कुछ।
विह्वल मन होठों को सी देंगे
अश्रु आंखों के सब कह देंगे
संवाद नही मौन चाहिए .....
प्रभु मौन की भाषा समझ लेंगे।।
💐💐💐💐
वक्त तेरी राहों पे चलते चलते उम्र ढल जाती है
बिन जिए ये जिन्दगी जाने कैसे गुजर जाती है।।
न शिकवा न शिकायत खामोशियों का अlलम है
वक्त की मेहरबानियों के आगे जिंदगी हार जाती है।
कहां से चले थे कहां पहुंचे गए हम पता नहीं
सुरभित सांसें आज वेदना के स्वर में खो जाती हैं।
मिट मिट कर जीवन मूल्य चुकाएं हैं नश्वर जग में
वक्त वेदी पर,अश्रु,लहरों के अर्घ्य चढ़ाने आती है।
जीवन के प्रश्नोत्तर समाप्त सभी हो जाते है.....
जब आशाएं बिन मंजिल पाए अदृश्य हो जाती हैं।
🌷उर्मिला सिंह🌷