Saturday, 23 May 2020

पद चिन्ह.....

ख्वाबों के  
ज़मीन पर
जिंदगी की 
बिखरी रेत पर
कुछ पदचिन्ह 
आज भी--
 दिख रहें हैं 
 धुंधले- धुंधले..
 शायद दर्द के 
 सागर ने अपना
 अधिपत्य जमा लिया।

मन ने चाहा 
देखना .....
उन पद चिन्हों को
पुनः.......
पर वक्त की लहरें
 भला क्यों छोड़ेगी,
 उन  के नामो निशान ।

  कल, और लहरे
  आएंगी.....
  मिटा जाएंगी 
  पद चिन्हों को
  बस रेत ही रेत दिखेगा..।

  पद चिन्हों की......
  सिसकियाँ 
  लहरों में...
  दब के रह जाएगी,
   दिल के कोने -में,
  या मशाल बन जलेगा ...
   प्रेरणा का स्रोत
   बन ....
   कर्तब्य की ....
   राह दिखाएगा।।
        ***0***
                 उर्मिला सिंह

Tuesday, 19 May 2020

भूख से बेहाल तन...

भूख से बेहाल तन ,भय से है गमगीन मन 
ख़ामोशी का समंदर ,विषयुक्त हुवा पवन 
सूनी राहें सन्नाटा पसरा ,ठिठका नज़र आता चाँद भी
आती जाती सांसे ,गिन रही हैं अपने दिन।

किन्तु हम फिर  जिंदगी को ,मधुमास कर लेंगे
हम पुनः मिल कर सभी में विश्वास भर लेंगे ।।

प्रकृति से खिलवाड़ ही ,विध्वंसकारी होगया
प्रकृति का रोष ,पंजे फैलाये ,नाग सा डस रहा
पर एक दिन ऐसा आएगा,मानव मन पछतायेगा
तृष्णा की बढ़ती ललक का, शीघ्र अवसान आयेगा।

तब फिर नई किरणे नव सर्जन का गान कर लेंगे
हम फिर  जिंदगी को ,मधुमास कर लेंगे........।

 चंचल तितलियों की, फिर धमाचौकड़ी होंगी
रात के संजोये, हसीन सपने सभी पूर्ण होंगे
धरा पर फिर नव बिहान, नव रस गान होंगे
हरिताभ खेत,बन,उपवन ,लहलहा के झूमेंगे ।

नूतन प्रकाश से धरा का ,कोना कोना भर लेंगे
हम फिर जिंदगी को ,मधुमास कर लेंगे.....।

इस नये जग का सृजन ,विश्वास की छाँव होगी
अधरों पे मुस्कान ,आंखों में प्यार होगा
प्रीत,के नवांकुर उगेंगे ,उर में करुण भाव होगा
स्वासों में सभी के ,प्यार और सत्कार होगा।

हर तरफ हम नव उल्लास  का ,आगाज़ कर लेंगे
हम मिल के फिर जिन्दगी को ,मधुमास कर लेंगे।।

जिन्दगी वश में नही,है किसी के यहां
सांस-सांस पर पहरा यहां है काल का
जो बचेगा वही नव सृजन नव उत्थान होगा
सत्य को परखना जो जनता है वही -
देश के लिए वरदान होगा.......।

धैर्य,आशा विश्वास श्रद्धा से जीवन सुगन्धित कर लेंगे
हम पुनः मिल कर फिर जिन्दगी मधुमास कर लेंगे.......।

         *******0******0******
                        उर्मिला सिंह




Saturday, 16 May 2020

एक पाती को मन तरसता....

दिखता नही अब डाकिया 
एक पाती को मन तरसता।

एक पाती को मन तरसता
काश मिल जाये बाँच लेता
बीते दिनों के ख़ुशगवार पल को
प्रिय ! मुट्ठियों में कैद कर लेता।

एक पाती को मन तरसता।

 द्वार पर आंखे गड़ी रहती...
 ह्रदय में प्रेम किसलय मचलते
 डाकिये के लिए प्रतीक्षित नैन मेरे
 उर की धड़कनो को तेज करते......।
 
 एक पाती को मन तरसता.....।
 
शब्द तेरे प्यार में घुले होते
मसि तेरे  प्रेमाश्रु  से लगते 
मोबाईल में शब्दों का समर्पण कहाँ
नवांकुर जो नेह के पाती में उगते !

एक पाती को मन तरसता......।


थैले में ढेर सारी पातिया 
सुख दुख के सारे पुलिंदे भरे
साइकिल की घण्टी सुनते.....
खिल जाते चेहरे सबके.....।

एक पाती को मन तरसता।
         *****0******

                उर्मिला सिंह



 

Thursday, 14 May 2020

चुटकी भर सिंदूर1

कुछ यादें ऐसी होती हैं जो पीछा नही छोड़तीं ...
यादों की अमराई में वक्त बे वक्त दस्तक दे ही देती हैं......!
          ऐसी ही आज की शाम है.....
          बच्चे कहीं गये हुएे हैँ .....!  
          पतिदेव दोस्तों के साथ बैठे हैं और मैं ख्यालों में जाने कहाँ घूम रही थी....!
           बात उन दिनों की है जब मैं वाराणसी में छात्रावास में रह कर पढ़ाई कर रही थी ! गर्मियों का अवकाश समाप्त हो गया था सभी क्षात्राऐं - कुछ पुरानी कुछ नई क्षत्रावास
में एक एक कर प्रवेश  ले रही थीं । पुरानी क्षात्राओं को नई लडकियों की थोड़ी खिंचाई करने में आनन्द आता था ..! और इसी क्रम में  रविवार का दिन भी समान्य तौर पर हसी मजाक में कट रहा था...।
            तभी एक लड़की अपने समान के साथ हम सभी के पास से गुज़री ....
            शान्त और सौम्य चेहरा,पतली- दुबली , गोरा रंग, चेहरे पर कहीं कहीं चेचक के दाग किन्तु उसके चेहरे की खूबसूरती में कहीं कोई कमी नही थी ....!
            साथ की लड़कियों ने कुछ कहा पर ऐसा लगा जैसे उसने सुन के भी अन- सुना कर दिया । न जाने क्यों , मुझे उसके प्रति एक अजीब सा लगाव महसूस हुआ ....! गुमसुम सी रहने वाली उस लड़की का नाम "देविका"था.. जूनियर होने के  कारण उसे दूसरे ब्लॉक में रूम मिला था और वह भी अकेले का।
             कभी - कभी मेस में खाना खाने के समय मुलाकात हो जाया करती  थी ...., 
             हाथ जोड़ कर उसका 'दी ' संबोधित करके अभिवादन करना मुझे आज भी याद है.......।
             उसे अपनी पढ़ाई ,कॉलेज और रूम के अतिरिक्त किसी से कोई सरोकार नही था....
             उसके समकक्ष की लड़कियां उसे घमंडी कहती तो कोई - कोई उसे गवार तक की संज्ञा दे डालती....
उसका मजाक बनाती .....पर    देवकी को कोई फर्क नही पड़ता। वह , महाविद्यालय और उसका होस्टल का  कमरा। 
               न तो उसका न कोई मित्र बना और न ही  उसे किसी को मित्र बनाने की चाह ही  थी .....
               इधर काफी दिनों से उससे मुलाकात नही हो रही थी..... ,
उसके अगल बगल रहने वाली लड़कियों से पूछा पर कुछ पता नही चला ......
               परन्तु यहीं से निःस्वार्थ मैत्री की डोर में हम बधने लगे ..... मेरे कदम अचानक उसके रूम की तरफ़ चल पड़े और उसके रूम के दरवाजे पर जाकर रुक गये.... किसी तरह से मैंने मन को समझाया और आवाज दिया...'देवकी'  , कुछ क्षड़ों बाद ही दरवाजा खुला......
 एक बारीक सी आवाज के साथ 'देवकी' मेरे सामने खड़ी थी " अरे दी आप ..."    मैंने कहा "इधर तुम कुछ दिनों से दिखाई नही पड़ी सोचा तुमसे मिल आती हूँ  ..."
 उसके अधरों पर पल भर के लिए स्मित हास्य की रेखा उभर आई ....., उसने कमरे में बैठाया.... मैंने पुनः उससे पूछा क्या "अस्वस्थ हो " उसने कहा "शरीर से नही मन से अस्वस्थ हूँ दी " .....नारी मन में किसी की बात  जानने की आकुलता या यूँ कह लीजिए कि जिज्ञासा होती है उसी से प्रेरित मेरे मन ने भी पश्न कर दिया "तुम्हारी शादी हो गई है....."
               निर्विकार भाव से उसका उत्तर मुझे मिला "दी सिन्दूर देख रही हैं न अगर इसे शादी कहते हैं तो होगई है...."
इस अप्रत्यासित उतर की मुझे आशा नही थी  .....
मैं सोच में पड़ गई कि मैं क्या कहूँ ...मेरे  इस उधेड़बुन की अप्रत्याशित चुप्पी देख कर  वो  स्वतः हँस पड़ी ....
देवकी ने पुनः कहना शुरू किया  "मेरी शादी के चार वर्ष कल पूरे हो गए दी ..., बैठिये न आप पहली बार मेरे रूम में आई हैं ,परन्तु आप प्रथम दिन से ही मुझे अच्छी लगती हो,आप न जाने क्यों मुझे अन्य लड़कियों से भिन्न दिखती हो ...." यह कहकर वो चुप हो गई।
         फिर इधर उधर की कुछ बाते हुईं..
 उस आत्मीयता के क्षण में लगा हम एक दूसरे को  अरसे से जानते हैं। उसको सबसे मिलते जुलते रहने की हिदायत देती हुई मैं अपने रूम में आगई।

         परन्तु उस दिन मेरा मन  पढ़ाई में नही लगा .....
बार - बार देवकी का मासूम चेहरा आ जाता और मैं उसके उत्तर को जितना सुलझाने का प्रयत्न करती उतनी ही उसकी गांठे मजबूत हो जाती.......
 उस अनसुलझी गांठ को खोलने के प्रयास में एक सिरा पकड़ती तो दूसरा छूट जाता  अंततः उसी उधेड़बुन में जाने कब निद्रा ने मुझे अपने मधुर आगोश में ले लिया। दिन बीतते रहे हम मिलते पर उस विषय पर कोई बात नही होती या यूँ कहें कि उसके मासूम पश्न का उत्तर मेरे पास नही था।
            फाइनल परीक्षा हुई  परीक्षा देकर जब मैं रूम में आई तो मेरी रूमेट ने बताया की देवकी आई थी और उसने मुझे बुलाया था। दूसरे दिन मेरा आखिरी पेपर था देकर मैं सीधे उसके कमरे में गई ,मुझे देख कर खुश हुई परन्तु डबडबाई आंखों से कह बैठी --ऐसा क्यों होता है जिसे मैं चाहती हूँ वही मुझसे दूर हो जाता है।पहले मां फिर पिताजी और बड़े भाई भाभी का स्नेह अनुराग न जाने कहाँ उड़ कर विलीन होगया। शादी हुई राजकुमार अमेरिका से ब्याहने आया दो दिन साथ रहा गौना की रश्म कर लेजाने का वादा करके जो गया तो पलट कर फिर नही आया । उसके मां बाप मुझे काम करवाने के लिए लेजाना चाहते थे परन्तु मेरे मामा ने नही जाने दिया और मेरा नाम यहां लिखवा दिया।बस मांग में चुटकी भर सिंदूर की सजा भोग रही हूँ।
            एक सांस में ही सारी बातें  वो कह गई  .....मै स्तब्ध,किंकर्तब्यविमूढ़ सी खड़ी रही..... क्या उत्तर देती !बस उसे गले से लगा लिया..... लगता था की वर्षों का रोका हुआ आसुओं का बांध टूट गया हो थोड़ी देर के बाद शांत हुई .....
 और नीचे सिर किये हुए ही कहा उसने "आज तक के मेरे जीवन की यही कहानी है। "
              अगले अंक में    .........              
                     
                                            उर्मिला सिंह
                 
                       
                        
                       
                        
                                     

Sunday, 10 May 2020

माँ.....

माँ तो सांसों में जीवन के हर पल में होती
माँ का कोई मुख्य दिन भी होता है ,
ये तो अता पता ही नही था मुझको....
हर दिन हमको तो माँ का दिन लगता है ।

उनके चरण स्पर्स जब जब करते थे ,
दुवाओं के पुष्प सदा हम पर गिरते थे
माँ के ममतामयी हथेलियों का स्पर्श
आज भी मन पल-पल अनुभव  करता  हैं ।
यादों के दिव्य कोष में माँ नाम अमर रहता है

उनकी मीठी-मीठी झिड़कियां सुनने को ,
आज भी  कान हमारे तरसा करते हैं ।
उनके हाथो के पकवानों की खुशबू  को.. 
अब उनकी यादों में हम ढूँढा करते है ।

माँ के पास थी नही  डिग्रियां कोई  
पर उनसा शिक्षक मिला न कोई  ।
तीन बच्चों की माँ हूँ,पर आदर्श उन्ही का-
बच्चों को,जीवन में सिखालाती  आई !

माँ में रामायण गीता , माँ में तुलसी माला,
माँ के चरणों में हरिद्वार,काशी और मथुरा !
माँ ममता की सागर , माँ  में ही परम् मोक्ष ,
चरणों में नतमस्तक रहेगा सर्वदा मन मेरा

यह सच है तुम देती नही मुझे दिखाई -पर
तेरे दिए संस्कार जिंदा हैं मुझमें आज भी
शाम को देहरी पर दीपक जलाना याद सदा रहता
तेरे पार्थना के स्वर गूँजते 'माँ' कानों में आज भी।।
         ******0******0*****
                           उर्मिला सिंह
        

Saturday, 2 May 2020

उम्र जाते जाते....

उम्र जाते जाते .....
***************
जिन्दगी! पतंग की तरह अम्बर में  उड़ जाने दे
उमंगो की स्वर  लहरी हवाओं  में बिखर जाने दे!       

तिमिर आच्छादित न हो  भावों को जरा महकने दे
कल  किसने देखा हँस के जिन्दगी गुजर जाने दे! .

जिन्दगी जीने की कसक रह न जाये कोई बाकी
रातरानी के फूलों से आज अंचल  भर जाने दे !  

बिछा के पलकों के  जाल कैद करलूँ उसको
उसके अधरों की मुस्कान संगीत बन जाने दे  !  

सिहर उठती है उर सरिता दिनकर छवि देख कर
नव प्रभात भरता उजास किरण संग मचल जाने दे!
     
                                                 #उर्मिल



                          
     
                        
                              ...
                              के
  

शोहरत पर मत कर अभिमान

शोहरत की मदिरा पर 
मत कर इतना गुमान रे इंसान
मत कर इतना अभिमान !

 है ये चार दिनों का खेला 
आज है कल मिट जाए रें इंसांन
मत कर इतना अभिमान !

महल अटारी ढह जायेंगे 
सत्कर्मों का लेखा जोखा ही नाम तेरा फैलाएगे 
माया लोभ के वस मैं आकर 
नफ़रत के जाल क्यों फैलाये रे इंसान,
मत कर इतना अभिमान !

जब छाये रात घनेरी ,
जब सूझे ना पथ दूजा कोई 
अंतर्मन का दीप तेरा राह दिखाए रे इन्सान,
मत कर इतना अभिमान !

परोपकारी के राहों में काटें 
बन पुष्प बिखर जाएं रे इंसान ,
मत कर इतना अभिमान !

 श्रेष्ठ वही जीवन जो 
 औरों के दुख दर्द में 
 करुणासिक्त बन बांह गहे रे इंसान 
  मत कर इतना अभिमान !

 मन मंथन कर सोच जरा 
 मानव निर्मम बन भवसागर
  कैसे पार करे रे इंसान ....
 मत कर इतना अभिमान।
     *****0*****0*****
                                   उर्मिला सिंह