Sunday, 11 September 2022

कलयुग

जीवन के पांच विकार ,काम,क्रोध,मोह,लोभ अरु अभिमान
कह गये वेद पुराण,पोथी गीता,संत सुजान।

फेसबुक,ट्विटर,यूट्यूब,वाट्सएप अरु इंस्ट्राग्राम
फिर क्यों बनादिए ये नए विकार बोलो हे करुना निधान।

इन शातिरों ने कर दिया जीना सबका दुष्वार
प्रातःउठ,लिए हाथ में घूमते जैसे हो ये भगवान।।

प्यार ,मोहब्बत,दोस्ती का है ये ठेकेदार
पथप्रदर्शक बन देता मोबाइल सबको ज्ञान।

इसके चंगुल से बच न पाए,ज्ञानी ध्यानी,वैरागी
यूट्यूब सुनाता गज़ल,भजनआरती के गान।। 

पति पत्नी और बच्चे वाट्स पर रहते मशगूल 
नोक झोंक होती पर नही छूटती इस से जान।

पत्राचार,मिलना जुलना बन्द वीडियो कॉलिंग में 
रहते मस्त
सोच रहा डाकिया पक्का कलयुग क्या यही है भगवान? 
                उर्मिला सिंह
                



                   


Monday, 18 July 2022

ॐ नमः शिवाय

आप सभी को सावन के सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएँ........
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मुण्डमाल,बाघम्बर सोहे.
विषधर संग छटा निराली
मस्तक गंगाधर,शशिधर सोहे
हस्त कपाल श्मशान बिहारी।।

योगी,भोगी अरु ध्यानी  ज्ञानी
आशुतोष तुम औघड़ दानी
भस्म,धतूरा  मदार पुष्प भावे..
तुम हो भोलेशकंरअंतर्यामी।।

ॐ नमः शिवाय हिय बसे 
हे !गौरीशंकर,हे!उमापते
जय-जय-जय हे अभ्यंकर 
अब करुणा कर, मेरे परमेश्वर.....।।

         उर्मिला सिंह
    🌼🌼🌼🌼🌼

Wednesday, 13 July 2022

गुरुपूर्णिमा के शुभ अवसर पर.......

आस्था दीप जला सदगुरु वाक्यों का अनुकरण करो....
'तुलसी' की  पूजा करने  वालों, 'गंगा' के गीत लिखो

कटीली टहनियों पर भी खिलते हैं महकते फूल,
दुश्मन की हथेली पर भी प्रेम गीत लिखो।

इधर उधर की बातें छोड़ दिल की बात सुनो,
तम की बात नही चाँदनी के गीत लिखो।

दर्द पराया महसूस कर, इंसान कहाने वालों,
इन्सानियत की कलम से प्रेम के नवगीत लिखो।

नये जमाने की चकाचौन्ध मेंभूलेसस्कृतिअपनी,
दादी-अम्मा के रीत -रिवाजों के स्नेहसिक्तसँगीत लिखो।
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               उर्मिला सिंह

Saturday, 9 July 2022

बदलते समय.....कच्चे रिश्ते....

आज का समय ....जहां रिश्ते मिनटों में बनते बिगड़ते हैं।
        
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शादियों में हल्दी चन्दन सिंदूर तो है
पर रिश्तों के बन्धन का  पता नही
मिठाई,बुलावा ढोल तमाशे तो हैं.....
रिश्तों में प्यार संवेदना का पता नही।।

लिफाफे,उपहार पेकिंग की तारीफ़ तो है शुभकामनाओं की गहराई का पता नही
डब्बो के रंग  डिजाइन की होती तारीफें
महक ,स्वाद का क्या होता कोई पता नही..।।

उम्मीदों की लालटेन हाथों में तो है
ख्वाबों की रोशनी का कुछ पता नही
खुशियों की चाभी औरों के हाथों में...
किस्मत की मंजिल का कोई पता नही।।
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             उर्मिला सिंह




Tuesday, 28 June 2022

एक ख्वाईश....पागल मन की

एक ख्वाईश....पागल मन की।

बारिष -बादल
सावन -झूले
सुहानी हवा
माटी की सुगंध
फूलों की खुशबू
पूरी कायनात महक उठे।।

एक ख्वाइश -पागल मन की।।

इंद्रधनुषी -अम्बर
विश्वाशों का सफर
अनन्त की प्रार्थना
 बारिश की बूंदे
 अन्तर्मन के भाव
 विभोर तन मन
 नयन कोरों से
 छलकते अश्क
 एक ख्वाइश -पागल मन की।।
 
      कुछ शब्द 
 यादों के पिंजरे से
      तस्वीर बन 
     सामने आते
बीते वक्त  के अहसास
 सुरीले गीत के स्वर
  गूंजते वादियों में।।

एक ख्वाईश - पागल मन की।।
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          उर्मिला सिंह
  
 
    
     


Monday, 13 June 2022

सत्य अजेय है.... एकता ताकत

सत्य को सब्र चाहिए जिन्दगी में भला कबतक
पत्थर बाजी बिगड़ते बोल भला सहे कब तक
कौन झुका कौन जीता कौन हारा मतलब नही थप्पड़ खाकर गाल आगे करते रहोंगे कबतक।।

जिसकी मन वाणी तीर की तरह चले हमेशा 
शिवाजी की तलवार राणा प्रताप का भाला  ,
बताओ हिन्द वालो  रुके भला कैसे.......
सच्चाई बिन डरे भीड़ से  कह दिया जो हमने
कोई बताए ज़रा कौन सा जुर्म कर दिया हमने।।

शराफ़त का चोला पहन बैठे रहोगे कबतक
होश में आये नही अगर आज भी तुम्ही कहो
आजाद भगत सिंह असफाक के बलिदान का
क्या जबाब दोगे आने वाली पीढ़ियों को कहो
पत्थरों से संवेदना भीख,मांगते रहोगे कब तक।।
   कब तक...कबतक....कबतक
   
               उर्मिला सिंह











Sunday, 22 May 2022

मन, कलम की गुफ़्तगू

मन,विचार का मिलन जब कलम से होता है तब कलम  पन्नों से कुछ गुफ़्तगू करने के लिए मचल पड़ती है.......

मन सोचा करता  है.....कभी कभी
    क्या पाया क्या खोया जग में
अपनो के आंखों में प्यार का गहरा सागर
    मन खोजा करता है कभी कभी।।
    
अधरों पर प्रीत की मीठी मुस्कान
    वाणी में मर्यादा और सम्मान
   अपनो का अपनापन अब कहाँ
 सब अतीत की बातें लगती हैं यहां।।
   
  मन सोचा करता है कभी कभी ।

जो दिल को नज़र आता था सदा.....
     वो खूबसूरतअनुभूति नही मिलती
      सरलता सादगी कोसों दूर हुई
भावों को समझे जो ऐसा मीत नही मिलता।।

  मन सोचा करता है कभी कभी।
  
चाहत के उपवन की भीनी भीनी सुगन्ध
     रिश्तों की पनपती शाखाएं
     और हसरतों के फूल घनेरे
   सब मुरझाए,मुरझाये से लगते हैं    
सुख की जाने क्यों अनुभूति नही होती।।

      मन सोचा करता है कभी कभी।   
  
जीवन दर्पण में भिन्न भिन्न चेहरे दिखते  
     अधूरी मुस्कान अधूरी बातें 
       अधूरे आँसूं अधुरे सपने
     अपनेपन की ढहती दीवारें
प्यार,स्नेह के मोती की माला बिखरी बिखरी
  

      मन सोचा करता है कभी कभी।

पाश्चात्य सभ्यता दोषी या संस्कार हैं दोषी
        नए जमाने की चकचौन्ध
        या कलयुग का आगमन 
     क्योंअनुराग सरिता जलविहीन हुई
धड़कन को क्यों  प्यार समझने में भूल हुई

      मन सोचा करता है कभी कभी
           

               उर्मिला सिंह