Thursday, 2 July 2026

बस कुछ यूँ ही...

बचपन की यादें उम्र की झुर्रियों तले छुप गई

हम देखते रहें जिन्दगी अपना वजीर चल गई


गिरती दीवारों को सम्हालता कौन है

कँपकपाते हाँथो कोें थामता कौन है


जिन्दगी अच्छी गुजरी,किश्मत की बात है

दर्द में जो गुजरी साहिब कर्मों की बात है!


हंगामा...

जिधर देखो उधर हंगामा.....ही हंगामा

कलियों को देख भौरों में .....हंगामा

रंगों की बौछार आई ...दिलों में ..... हंगामा.....

दुकानों में अबीर गुलाल पिचकारियों का हंगामा


जिधर देखो उधर हंगामा ही ......हंगामा 


शादी में बरातियों के जाम का  हंगामा

लड़के वालों के मन में दहेज का हंगामा

दूल्हे के दिल में छलकते प्यार का हंगामा

दुल्हन के ह्रदय में बिछुड़ने का हंगामा।।


जिधर देखो उधर हंगामा ही.....हंगामा।


 घर में अधिकारों पर सास बहू में हंगामा

 पति पत्नी में अहम  के टकराव का हंगामा

 नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी में विचारों का हंगामा

 पास पड़ोस दोस्तों में आगे बढने का हंगामा।।


 जिधर देखो उधर  हंगामा ही.......हंगामा।


 राजनीति गलियारे में कुविचारों का  हंगामा

 संसद में मारपीट करते सांसदों का हंगामा

 मचा है सृष्टि में 

  


जनता में महंगाई बिजली पानी का हंगामा

नेताओं ,दलों में सत्ता हथियाने का हंगामा

गरीबी,बेकारी दूर खड़ी देख रही   निःशब्द

वोट किसे  देना होगा मचा है मन में हंगामा।।


    जिधर देखो उधर हंगामा ही..... हंगामा।


              उर्मिला सिंह

Monday, 29 June 2026

चलन दुनिया का

चलन दुनिया का
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दुनिया का चलन 
लगे सीखने सबक
बहुत नादान थे हम 
समझ न पाये सबब।

छल प्रपंच से भरी
 ये दुनिया सारी
देखी जो बेहाली
नम हुईं आंखे हमारी।

'पैरों तले खिसकने
लगी जमीन'
हम सम्भलने लगे 
रफ्ता-रफ्ता बढ़ने लगे।

थक कर बैठे न हम
पांव जख्मी हुवे
अश्क ढुरते रहे
मलहम को तरसते हम।

दुनिया की हकीकत 
रिश्तों की गठरी खुली
उघड़ी तुरपाई की मरम्मत हुई
 जिन्दगी आहिस्ता आहिस्ता
 कांटों में  खिलने लगी।।

      उर्मिला सिंह

Monday, 8 December 2025

हमदर्द

हमदर्द.... ..


अश्कों को हमदर्द बना 

 दर्द गले लगातें हैं

मुझसे मत पूछो दुनिया वालों 

अधरों पर मुस्काने

 किस तरह सजातें हैं।।


 फूलों की चाहत में 

 काटों को भूल गए

 आहों ने जब याद दिलाया

 सन्नाटों से समझौता कर बैठे।।


सन्देह के घेरे में जज्बात रहे

लम्हे अपने,अपने न रहे

फरियादी फरियाद करे किससे

जब कातिल ही जज की ......

कुर्सी पर आसीन  रहे.... 


 लफ्जों में पिरोतें हैं 

 एहसासों के मोती

 संकरी दिल की गलियों में

 कौन लगाता कीमत इनकी।।

 

 निद्र वाटिका में 

 अभिलाषाएं मचलती 

  जीवन से जीवन की दूरी 

  दूर नही कर पाती हैं....

  फिर भी  देहरी पर

  उम्मीदों के दीप जलाती है।।


     उर्मिला सिंह

  

  

  

Monday, 1 December 2025

सुस्त कदम मेरे

सुस्त कदम मेरे....

   🌺🌺🌺

चलते  चलते,....

रुक जाते ....

एक मोड पर ये 

थके थके, रुके रुके

अलसाए ...

सोचों में हैं खोए 

कौन डगर जाऊं

कुछ समझ न पाए

ये सुस्त कदम मेरे।

 पांवों की सुस्ती

दिल दिमाग पर छाती

 हर राह यहां अब

 लगती है बेगानी 

 जर्जर नैया 

डोल रही 

भव सागर में

ना कोई खेवैया

सोच में डूबी

नश्वर काया ....

तेरा मेरा बहुत किया

क्या पाया क्या खोया

    इस जग से

सिर धुन धुन पछताता क्यों

सुस्त थके ...कदम मेरे....

        उर्मिला सिंह