Wednesday, 16 September 2026

नवरस

नवरस
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  नवरस संचित होते मन में 
     स्फुरण होते भावों के
  सुरभित शब्द हार बनते उससे
      नव रस बिखरने लगते ।

  उर से भाव निकलते जब
   कलम सजग हो जाती
पन्ने शब्दों की अगवानी करते
  सरस् सरिल सरिता बहती जाती।

 विविध भाव अंकुरित पन्नो  पर
      ममता की दरिया बहती
  डोरे डालते भ्रमर कलियों पर
  कभी दुश्मन पर तलवार निकलती ।

सजती  बारात  कभी  तारों  की 
   चाँद कभी आंगन मुस्काता
दिग दिगांत सुरभित हो इठलाता
    दृग से अनुराग छलकता
 शब्द  पंखुरी  पन्नों  पर झरती । 

  मन की  पीड़ा अधर तक  पहुंचती
     ह्रदय वेदना से चीख निकलती
 पन्ने  मुखर , कलम  संवाद  बनाते
      मसि मोती सम चमकती
      
 नवरस भाव गुंजित कविता  सजती।

            उर्मिला सिंह

Sunday, 30 August 2026

'माँ शब्द छोटा है परन्तु.......

'माँ '
         बहुत छोटा शब्द हे मां
    प्यार, त्याग ममता की मूरत है माँ 
             🍁🍁🍁🍁🍁
         जब हम छोटे होते थे 
        और चोट लग जाती थी
      हम मां को पुकारा करते थे।।
 
     माँ आके चुप कराती थी 
     चुम्मी देके हमें कहती थी
  कुछ नहीं हुआ ठीक हो जाएगा।।

     और हम पुनः खेलने लगते थे 
      माँ पर अटूट विश्वास जो था
   माँ की बात भला झूठी हो सकती है।।
 
        वक्त बदला लोग बदले
        शायद हम भी बदल गए
    तभी तो माँ की बातों से विश्वास उठा।।

          माँ आज  नहीं है
       चोट लगती है आज भी
     हृदय रो पड़ता है मां कह के
       पर अब मां नहीं आती
खामोश लब भिंगे नयन और तन्हाइयां 
     पर अब माँ नहीं आती. कहने
'कुछ नहीं हुआ बेटा सब ठीक हो जाएगा '।।
             
           🌹उर्मिला सिंह🌹

Monday, 3 August 2026

बन्दे मातरम्

*बन्दे मातरम्*

धरती की मौन व्यथा समझे कौन... 
सूरज की मौन लिपी समझे कौन....
जो बाट रहे खण्ड-खण्ड में देश  को
ऐसे गद्दारों को देश प्रेम समझाएं कौन!
 🍁🍁🍁🍁🍁
केंचुल-सा आवरण हटा...
भ्र्ष्टाचारी सब एक हुए 
इसी प्रेम ने सबको आलिंगनबद्ध किये...
 राजनीती का स्तर गिरा, हो रहा तांडव नृत्य...
जाल झूठ का बुनते हुए
 कर रहे हैं ये कुकृत्य! 
   🍁🍁🍁🍁🍁
विषधारी तेरे फन से सत्य का आस्तित्व बड़ा ...
झूठ की ज्वाला में तेरे पूर्वजों का आदर्श जल रहा....
असत्य इतना न उछाल कि पराजय बन जाय तेरी...
जला सके प्रहलाद को
 कोई जग में ऐसा ताप नही...।
 🍁🍁🍁🍁🍁            
कर्म तुम्हारा जनता सब जानती है....
तुम कितने पानी में हो जनता पहचानती है...
झूठ कीआंधी ज्यादा दिन टिकती नही...
मकसद तो  केवल तुम सबका सत्ता पाना है!
   🍁🍁🍁🍁🍁
 देश के दुश्मनो ,सावधान जनता सब जानती ..है !
हर तीर तुम्हारा सत्य से टकरा 
वापस तेरे पास ही जायेगा... 
क्योंकी.......
जनता षडयंत्र तुम्हारा सब जानती है.....।
             उर्मिला सिंह 
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Thursday, 2 July 2026

बस कुछ यूँ ही...

बचपन की यादें उम्र की झुर्रियों तले छुप गई

हम देखते रहें जिन्दगी अपना वजीर चल गई


गिरती दीवारों को सम्हालता कौन है

कँपकपाते हाँथो कोें थामता कौन है


जिन्दगी अच्छी गुजरी,किश्मत की बात है

दर्द में जो गुजरी साहिब कर्मों की बात है!


हंगामा...

जिधर देखो उधर हंगामा.....ही हंगामा

कलियों को देख भौरों में .....हंगामा

रंगों की बौछार आई ...दिलों में ..... हंगामा.....

दुकानों में अबीर गुलाल पिचकारियों का हंगामा


जिधर देखो उधर हंगामा ही ......हंगामा 


शादी में बरातियों के जाम का  हंगामा

लड़के वालों के मन में दहेज का हंगामा

दूल्हे के दिल में छलकते प्यार का हंगामा

दुल्हन के ह्रदय में बिछुड़ने का हंगामा।।


जिधर देखो उधर हंगामा ही.....हंगामा।


 घर में अधिकारों पर सास बहू में हंगामा

 पति पत्नी में अहम  के टकराव का हंगामा

 नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी में विचारों का हंगामा

 पास पड़ोस दोस्तों में आगे बढने का हंगामा।।


 जिधर देखो उधर  हंगामा ही.......हंगामा।


 राजनीति गलियारे में कुविचारों का  हंगामा

 संसद में मारपीट करते सांसदों का हंगामा

 मचा है सृष्टि में 

  


जनता में महंगाई बिजली पानी का हंगामा

नेताओं ,दलों में सत्ता हथियाने का हंगामा

गरीबी,बेकारी दूर खड़ी देख रही   निःशब्द

वोट किसे  देना होगा मचा है मन में हंगामा।।


    जिधर देखो उधर हंगामा ही..... हंगामा।


              उर्मिला सिंह

Monday, 29 June 2026

चलन दुनिया का

चलन दुनिया का
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दुनिया का चलन 
लगे सीखने सबक
बहुत नादान थे हम 
समझ न पाये सबब।

छल प्रपंच से भरी
 ये दुनिया सारी
देखी जो बेहाली
नम हुईं आंखे हमारी।

'पैरों तले खिसकने
लगी जमीन'
हम सम्भलने लगे 
रफ्ता-रफ्ता बढ़ने लगे।

थक कर बैठे न हम
पांव जख्मी हुवे
अश्क ढुरते रहे
मलहम को तरसते हम।

दुनिया की हकीकत 
रिश्तों की गठरी खुली
उघड़ी तुरपाई की मरम्मत हुई
 जिन्दगी आहिस्ता आहिस्ता
 कांटों में  खिलने लगी।।

      उर्मिला सिंह