Sunday, 31 May 2020

रात के निमंत्रण पर....

रात के निमन्त्रण पर
तारे छा गए अम्बर पर
चाँद  भी रुक न  पाया
जब चाँदनी ने ......
आकर जाम छलकाया।।

इश्क की दस्तक हुई
पवन ने मीठी सुर छेड़ी
 रात मुस्कुरा उठी......
 दिलों में हलचल हुई...
 ख़ामोश आंखे मदहोश सी....
 रात की दहलीज पर....
 दो फूल घायल.....
 निः शब्द ......
   ***0***
   उर्मिला सिंह
 
     
            

Saturday, 30 May 2020

दीप शिखा का प्रणयी शलभ हूँ.....

  मैं प्रीत से  सम्मोहित  शलभ हूँ
   दीपशिखा का प्रणयी शलभ हूँ।

    स्वर्णिम रूप से घायल ये दृग मेरे
    प्रीत के रंग से रंगें ये मृदु पंख मेरे    
    मिलन की आस संजोये मन में .....  
    प्रदक्षिणा रत रहता निरन्तर लौ के ।
                                           
       दीपशिखा का प्रणयी शलभ हूँ।
       
     दीप! तेरी लौ को जलते देख के 
    आलिंगनबद्ध की ह्रदय में चाह लेके
     मधुर मिलन में मिट जाना ध्येय मेरा
     है तुम्हारी प्रीत का यही समर्पण मेरा ।
     
      मैं दीप शिखा का  प्रणयी शलभ हूँ।

       मिलन, विरह होते  कहाँ  प्रीत में
       प्रतिदान मांगता कहा ह्रदय प्रीत में
       तुम्हारे अंकपास में चिरसमाधि होगी
       मिलन की वही प्रारम्भ और अंत होगा।

       मैं दीप शिखा तेरा प्रणयी शलभ हूँ।
                  *****0*****
                   उर्मिला सिंह
       

                                         

Wednesday, 27 May 2020

इंसानी छाप....

हे प्रभू जब तुम अवतरित हुवे
तो अपनी मुरली की छाप छोड़ गए
माटी अपनी छाप छोड़ जाती है
पक्षी भी जहां से उड़तें हैं वहां --
अपना पंख छोड़ देते हैं.......
फूल पवन में अपनी सुगन्ध छोड़ देता है।

लहरे छाप के रूप में ......
शंख ,सीपियों को छोड़ जाती हैं।
मछली पानी में अपनी गन्ध छोड़ देती है
पर एक इंसान ही ऐसा जीव ......है 
जिसके रचयिता भी तुम्ही ........
जीवन देने वाले भी तुम्ही .......
करुणा सत्कार दया सभी कुछ .....
उपहार स्वरूप तुम्हारे द्वारा ही प्रदत्त है
परन्तु मनुष्य अपनी .....
मनुष्यता का छाप क्यों नही छोड़ पाता....
मनुष्य होने की अपनीसुगन्ध कहीं.....
क्यों नही बिखेर पाता......
क्यों नही बिखेर पाता......।
   ****** 0******
                    उर्मिला सिंह




Tuesday, 26 May 2020

गतांक से आगे.......चुटकी भर सिंदूर.......

चुटकी भर सिन्दूर.....

गतांक से आगे.......
परीक्षा समाप्त होते ही  क्षात्रावास से  क्षात्राएँ  धीरे धीरे घर जाने लगी। छात्रावास खाली होरहा था। कुछ लड़कियों की परीक्षा समाप्त नही हुई थी बस वही रह गईं थी।
         हमने भी सभी से विदा लिया क्योंकि हमारा आखिरी साल था। बी .ए. अन्तिम वर्ष की परीक्षा समाप्त कर मैने भी घर जाने की तैयारी कर ली थी । न जाने कब मिलें न मिले अश्रुपूर्ण नेत्रों से हम सभी एक दूसरे के गले लग रहे थे। परन्तु उस भीड़ में देवकी मुझे दिखाई न पड़ी ।  मन ने कहा "चलो रूम में जाकर मिल आतें हैं..."
 परन्तु न जाने क्या सोच कर मेरे  कदम रुक गए ।गाड़ी में अपना  समान रखवा ही रही थी  तभी मेरी कुछ सहेलियों ने कहा"उर्मिल तुम्हारी देवकी आरही है " हमने भी उसी लहज़े में हंसते हुवे कहा "अच्छा तो तुम सभी को क्यों जलन होरही है " ....गमगीन वतावरण , हंसी के ठहाकों से गूंज उठा ..... !  विद्यार्थी जीवन  कितना आनंदमय होता है अब सोचती हूँ   ...  
 
"गुज़र गये वो अच्छे दिन थे ,जो कभी लौट के नहीं आएंगे"
 
वो हंसी,वो मस्ती ,प्यार तकरार सभी स्वप्नवत हो गये......

 अरे! कहाँ मन भावनाओं में बह गया......
       
 देवकी को देखते ही मेरा चेहरा खिल उठा,मानो मेरी आंखों को उसी का इंतजार था। वह धीरे- धीरे अपने आंसुओंं को छुपाते हुए  मेरे करीब आई , मैंने स्नेह से उसे बांहो में भर लिया,बस क्या था उसके सब्र का बांध टूट गया .......
वो सिसक-सिसक कर रोती रही .....
मैंने उसे बहुत चुप कराया पर....  
 सिसकते-सिसकते उसने कहा.......
 "दी ...आज के बाद मेरी आंखों में आंसू नही दिखें गे आपने जैसा बनने को कहा है मैं वैसा ही बन कर दिखाउंगी विश्वास करिये मेरा".....। 
 एक लिफाफा मुझे पकड़ा कर पैर छूकर चली गई......... मैं उसे जाते हुवे देखती रही .....
 जब मेरी सहेलियों ने कहा "अरे भई हम भी आपके हैं,
 निगाहें करम इधर भी कीजिये....."और पुनः बोझिल वातावरण ......मुस्कुराहटों में बदल गया।
 
इस तरह से छात्रावास का सुनहरा  समय अतीत के गर्भ में छुप गया.... और हम भी अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करने  लगे।
 आगे पढ़ने की इक्छा होती तो दादी ,चाचा वगैरह मना करते क्योंकि उस समय लड़कियों को ज़्यादा पढाने के पक्ष में समाज नही था,खास कर राजपूत समाज ....। 
खैर वक्त बीतता गया  समय के सांचे में मैं भी ढलती गई। फिर इसी बीच एक दिन मेरी भी शादी होगई, सभी यादें पुरानी होने लगी तमाम खट्टी मीठी यादों को समेटे न जाने कितने वर्ष बीत गए पर देवकी को भूलना आसान नही था उससे जुड़े  प्रश्न मेरा पीछा गाहे बेगाहे करते रहते  थे।

    हमारे पति ने भी सर्विस जॉइन कर ली । उनके। साथ साथ हम भी कानपुर ,मध्य प्रदेश हिंडाल्को इत्यादि जगहों में घूमते रहे।
    तत्पश्चात  ओ एन जी सी , देहरादून में जॉइन किया...।
इसी बीच  बच्चे भी बड़े होगये ....और जगंह -जगंह शिक्षा ग्रहड़ करने लगे ....।
एक दिन हमारे चाचा जी का  गाँव से एक पत्र आया उसे जब खोला तो प्रसन्नता का ठिकाना नही था उसमें देवकी का भी पत्र मिला उस छोटे से पत्र में देवकी ने बहुत कुछ लिख दिया था....।
उसने मेरी एक सहेली से मेरे गांव का पता ले लिया था इतने दिनों के बाद उसका ये पत्र पाकर  मैं खुसी से झूम उठी परन्तु उस पत्र में उसने सिर्फ लिखा था"दी यह पत्र मैंने चाचा जी को लिखा है आप कहाँ हैं मुझे पता नही परन्तु आप से मिलूंगी जरूर एक दिन.....,
आपकी देवकी अपने पैरों पर खड़ी हो गई है ....
शायद मेरी सजा ही मेरे लिए वरदान होगई"....
बस इसके आगे कुछ भी नही।न अता न पता.....
मेरे समझ में नही आरहा था की ऐसी क्या बात हो गई।
     खैर दिन गुज़रते रहे हम भी अपने पारिवारिक दायित्वों को बखूबी निभाते हुए में व्यस्त हो गये .....
 मेरे पतिदेव भी यदा कदा पूछ लिया करते थे की भाई तुम्हारी सहेली का क्या हुआ ? मैं मुस्कुरा कर टाल दिया करती  थी........
        
समय अपनी रफ़्तार से चल रहा था ....
        
हम भी उसी की धार में बह रहे थे.....

हमारी पड़ोसन की लड़की की शादी पक्की हुई...  प्रत्येक रस्म पर हम पूरे परिवार सहित आमन्त्रित होते थे। उनके घर लड़की की शादी का संगीत था,बाहर वाले मेहमान भी आरहे थे  एक तो देहरादून घूमने का शौक दूसरे शादी सोने पर सुहागा।
            उनके ड्राइंग रूम में संगीत चल रहा था  सभी गाने बजाने में मस्त थे तभी बाहर से कई लोगों की एक साथ हंसने की आवाज सुनाई पड़ी .....
 गाते -गाते हम सभी का ध्यान शोर की तरफ आकर्षित हुआ  तो देखा कि  मिसेज मिश्रा के संग एक 55- 60 साल की ओरत सौम्य चेहरा गम्भीरतायुक्त आंखे  उसके साथ एक युवक हंसता हुवा चला आरहा है एकाएक सभी की आंखे उन अजनबी चेहरों पर ठिठक गई....।
           मैने भी पलके उठा कर देखा....और  देखती रह गई कुछ देर तक.....जाना -  पहचाना  सा चेहरा लगा फिर किसी से बात करने लगी पर.......ये क्या वह तो सभी को छोड़ मेरे ही पास चली आरही थी एक मिनट को तो मैं भी स्तब्ध रह गई......
            परन्तु दूसरे ही पल उन्हें झुकते देख सभी कुछ चल चित्र की भांति सामने आगया वह कोई और नही मेरी प्रिय देवकी थी। खुशी की तो पूछिये मत सभी लोग इस दृश्य को देख ठगे रह गए। उसने - अपने साथ के युवक से मेरा परिचय कराया और बताया दी यह मेरा बेटा है  उस युवक ने पैर छू कर अभिवादन किया  और कहा "आप उर्मिल मासी हैं न, मां आपकी बाते किया करती थीँ "  मैंने हंस कर  प्यार से उसके सिर पर हाथ फेर करआशिर्वाद दिया 
         
हजारों प्रश्न मन में थे परन्तु.........।
         
        गीत- संगीत  चलता रहा .....
        हम सभी चाय नास्ता कर रहे थे साथ ही साथ बातों का भी दौर चलता रहा ...। देवकी ने मुझ से पूछा" पूछेंगी नही दी कि ये लड़का तुम्हारा है"मैंने हंस दिया उसका दूसरा पश्न था" दी आज मैं आपके पास रहूंगी" मैंने कहा ये तो मेरे लिए सौभाग्य की बात है।
           प्रोग्राम समाप्त होते ही "सजल" जो उसके लड़के का नाम था अपने दोस्त के यहां देवकी से पूछ कर मिसेज मिश्रा के लड़के के साथ चला गया।हम देवकी को अपने घर ले आये। रात्रि का भोजन उन्हीं के घर होगया था....
           
                 बस रात तो अपनी थी पतिदेव भी देवकी से बातें करके चले गए। बगैर किसी प्रस्तवना के देवीकी ने बोलना शुरू किया "दी यह बेटा मुझे भगवान का दिया हुआ उपहार है..... ,आज भी वो बरसात की  रात मुझे याद है जब मैंने एक युवती को पानी में भीगते हुए अपने गेट के पास  गोद में बच्चे को आँचल से छुपाये ठंढ से कांप रही थी," बरामदे में बैठी मैं किताब पढ़ रही थी अचानक मेरी निगाह गेट पर गई मैंने चौकीदार को बुला कर उस औरत को अंदर बुलाया ,मैंने उसे गौर से देखा और कहा कि इतने पानी में छोटे बच्चे को लेकर यहां क्या कर रही हो उसने कहा " मैं इस संसार में अकेली हूँ पति की दुर्घटना में मौत हो गई जहां रहती थी मकान मालिक ने निकाल दिया  ,मैडम क्या आप मुझे अपने घर में रक्खें गी मैं "आपका सभी काम करूँगी,"  मैने उसका नाम पूछा उसने कल्याणी बताया बस यही उसका परिचय था बगैर उसके विषय में ज्यादा जाने  समझे हां कर दिया।
                 
मैंने सोचा क्या लेके जाएगी मेरे पास है ही क्या और वह मेरे पास ही रहने लगी कुछ कपड़े मां बेटा के लिए खरीद दिया।
बस यहीं से पतझड़ सरीखे मन में बसन्त का आगमन हुआ,
पहले कॉलेज से घर लौटने के लिए एक -एक कदम भारी होता था पर अब.........घर पहुंचने को आतुर.....। 
खुशियों के दिन पंख लगा कर उड़ रहे थे तभी कल्याणी बीमार पड़ी ...... डॉक्टरों को दिखाया पर केंसर की आखिरी स्टेज बताया.....
मेरी खुशियों के पंख एक बार पुनः लहू-लुहान हो रहे थे......
और एक दिन ऐसा आया जब रुपया पैसा कुछ भी उसे बचा नही सके और वह अनन्त में विलीन हो गई।
मैं सजल को सीने से लगाए किंकर्तव्यविमूढ़ सी बैठी रही
जब सजल मां को पूछता तो मैं फफककर रो उठती क्या बताती उसे मेरी बदनसीबी ने उसे भी अपने हाँथों डंस लिया। मुझे बड़ी मां कहता उसका नाम  एक अच्छे स्कूल में लिखवा दिया  एक आया रक्खा पर कॉलेज से आने के बाद पूरा समय उसी के साथ बीतता।आज वह अच्छे पद पर है बाहर जाने का भी ऑफर आया पर बड़ी मां को छोड कर उसे कहीं जाना स्वीकार  नही .....बहू के भी पांव भारी हैं ।बहू से बेटी जैसा  प्यार पा कर निहाल हो जाती हूँ"बस यही कहानी है  "ममत्व का सुख पाकर चुटकी भर सिन्दूर की सजा भूल गई दीदी"..........

                                                   उर्मिला सिंह

              
                 
                 
                  
      
         

Saturday, 23 May 2020

पद चिन्ह.....

ख्वाबों के  
ज़मीन पर
जिंदगी की 
बिखरी रेत पर
कुछ पदचिन्ह 
आज भी--
 दिख रहें हैं 
 धुंधले- धुंधले..
 शायद दर्द के 
 सागर ने अपना
 अधिपत्य जमा लिया।

मन ने चाहा 
देखना .....
उन पद चिन्हों को
पुनः.......
पर वक्त की लहरें
 भला क्यों छोड़ेगी,
 उन  के नामो निशान ।

  कल, और लहरे
  आएंगी.....
  मिटा जाएंगी 
  पद चिन्हों को
  बस रेत ही रेत दिखेगा..।

  पद चिन्हों की......
  सिसकियाँ 
  लहरों में...
  दब के रह जाएगी,
   दिल के कोने -में,
  या मशाल बन जलेगा ...
   प्रेरणा का स्रोत
   बन ....
   कर्तब्य की ....
   राह दिखाएगा।।
        ***0***
                 उर्मिला सिंह

Tuesday, 19 May 2020

भूख से बेहाल तन...

भूख से बेहाल तन ,भय से है गमगीन मन 
ख़ामोशी का समंदर ,विषयुक्त हुवा पवन 
सूनी राहें सन्नाटा पसरा ,ठिठका नज़र आता चाँद भी
आती जाती सांसे ,गिन रही हैं अपने दिन।

किन्तु हम फिर  जिंदगी को ,मधुमास कर लेंगे
हम पुनः मिल कर सभी में विश्वास भर लेंगे ।।

प्रकृति से खिलवाड़ ही ,विध्वंसकारी होगया
प्रकृति का रोष ,पंजे फैलाये ,नाग सा डस रहा
पर एक दिन ऐसा आएगा,मानव मन पछतायेगा
तृष्णा की बढ़ती ललक का, शीघ्र अवसान आयेगा।

तब फिर नई किरणे नव सर्जन का गान कर लेंगे
हम फिर  जिंदगी को ,मधुमास कर लेंगे........।

 चंचल तितलियों की, फिर धमाचौकड़ी होंगी
रात के संजोये, हसीन सपने सभी पूर्ण होंगे
धरा पर फिर नव बिहान, नव रस गान होंगे
हरिताभ खेत,बन,उपवन ,लहलहा के झूमेंगे ।

नूतन प्रकाश से धरा का ,कोना कोना भर लेंगे
हम फिर जिंदगी को ,मधुमास कर लेंगे.....।

इस नये जग का सृजन ,विश्वास की छाँव होगी
अधरों पे मुस्कान ,आंखों में प्यार होगा
प्रीत,के नवांकुर उगेंगे ,उर में करुण भाव होगा
स्वासों में सभी के ,प्यार और सत्कार होगा।

हर तरफ हम नव उल्लास  का ,आगाज़ कर लेंगे
हम मिल के फिर जिन्दगी को ,मधुमास कर लेंगे।।

जिन्दगी वश में नही,है किसी के यहां
सांस-सांस पर पहरा यहां है काल का
जो बचेगा वही नव सृजन नव उत्थान होगा
सत्य को परखना जो जनता है वही -
देश के लिए वरदान होगा.......।

धैर्य,आशा विश्वास श्रद्धा से जीवन सुगन्धित कर लेंगे
हम पुनः मिल कर फिर जिन्दगी मधुमास कर लेंगे.......।

         *******0******0******
                        उर्मिला सिंह




Saturday, 16 May 2020

एक पाती को मन तरसता....

दिखता नही अब डाकिया 
एक पाती को मन तरसता।

एक पाती को मन तरसता
काश मिल जाये बाँच लेता
बीते दिनों के ख़ुशगवार पल को
प्रिय ! मुट्ठियों में कैद कर लेता।

एक पाती को मन तरसता।

 द्वार पर आंखे गड़ी रहती...
 ह्रदय में प्रेम किसलय मचलते
 डाकिये के लिए प्रतीक्षित नैन मेरे
 उर की धड़कनो को तेज करते......।
 
 एक पाती को मन तरसता.....।
 
शब्द तेरे प्यार में घुले होते
मसि तेरे  प्रेमाश्रु  से लगते 
मोबाईल में शब्दों का समर्पण कहाँ
नवांकुर जो नेह के पाती में उगते !

एक पाती को मन तरसता......।


थैले में ढेर सारी पातिया 
सुख दुख के सारे पुलिंदे भरे
साइकिल की घण्टी सुनते.....
खिल जाते चेहरे सबके.....।

एक पाती को मन तरसता।
         *****0******

                उर्मिला सिंह



 

Thursday, 14 May 2020

चुटकी भर सिंदूर

कुछ यादें ऐसी होती हैं जो पीछा नही छोड़तीं ...
यादों की अमराई में वक्त बे वक्त दस्तक दे ही देती हैं......!
          ऐसी ही आज की शाम है.....
          बच्चे कहीं गये हुएे हैँ .....!  
          पतिदेव दोस्तों के साथ बैठे हैं और मैं ख्यालों में जाने कहाँ घूम रही थी....!
           बात उन दिनों की है जब मैं वाराणसी में छात्रावास में रह कर पढ़ाई कर रही थी ! गर्मियों का अवकाश समाप्त हो गया था सभी क्षात्राऐं - कुछ पुरानी कुछ नई क्षत्रावास
में एक एक कर प्रवेश  ले रही थीं । पुरानी क्षात्राओं को नई लडकियों की थोड़ी खिंचाई करने में आनन्द आता था ..! और इसी क्रम में  रविवार का दिन भी समान्य तौर पर हसी मजाक में कट रहा था...।
            तभी एक लड़की अपने समान के साथ हम सभी के पास से गुज़री ....
            शान्त और सौम्य चेहरा,पतली- दुबली , गोरा रंग, चेहरे पर कहीं कहीं चेचक के दाग किन्तु उसके चेहरे की खूबसूरती में कहीं कोई कमी नही थी ....!
            साथ की लड़कियों ने कुछ कहा पर ऐसा लगा जैसे उसने सुन के भी अन- सुना कर दिया । न जाने क्यों , मुझे उसके प्रति एक अजीब सा लगाव महसूस हुआ ....! गुमसुम सी रहने वाली उस लड़की का नाम "देविका"था.. जूनियर होने के  कारण उसे दूसरे ब्लॉक में रूम मिला था और वह भी अकेले का।
             कभी - कभी मेस में खाना खाने के समय मुलाकात हो जाया करती  थी ...., 
             हाथ जोड़ कर उसका 'दी ' संबोधित करके अभिवादन करना मुझे आज भी याद है.......।
             उसे अपनी पढ़ाई ,कॉलेज और रूम के अतिरिक्त किसी से कोई सरोकार नही था....
             उसके समकक्ष की लड़कियां उसे घमंडी कहती तो कोई - कोई उसे गवार तक की संज्ञा दे डालती....
उसका मजाक बनाती .....पर    देवकी को कोई फर्क नही पड़ता। वह , महाविद्यालय और उसका होस्टल का  कमरा। 
               न तो उसका न कोई मित्र बना और न ही  उसे किसी को मित्र बनाने की चाह ही  थी .....
               इधर काफी दिनों से उससे मुलाकात नही हो रही थी..... ,
उसके अगल बगल रहने वाली लड़कियों से पूछा पर कुछ पता नही चला ......
               परन्तु यहीं से निःस्वार्थ मैत्री की डोर में हम बधने लगे ..... मेरे कदम अचानक उसके रूम की तरफ़ चल पड़े और उसके रूम के दरवाजे पर जाकर रुक गये.... किसी तरह से मैंने मन को समझाया और आवाज दिया...'देवकी'  , कुछ क्षड़ों बाद ही दरवाजा खुला......
 एक बारीक सी आवाज के साथ 'देवकी' मेरे सामने खड़ी थी " अरे दी आप ..."    मैंने कहा "इधर तुम कुछ दिनों से दिखाई नही पड़ी सोचा तुमसे मिल आती हूँ  ..."
 उसके अधरों पर पल भर के लिए स्मित हास्य की रेखा उभर आई ....., उसने कमरे में बैठाया.... मैंने पुनः उससे पूछा क्या "अस्वस्थ हो " उसने कहा "शरीर से नही मन से अस्वस्थ हूँ दी " .....नारी मन में किसी की बात  जानने की आकुलता या यूँ कह लीजिए कि जिज्ञासा होती है उसी से प्रेरित मेरे मन ने भी पश्न कर दिया "तुम्हारी शादी हो गई है....."
               निर्विकार भाव से उसका उत्तर मुझे मिला "दी सिन्दूर देख रही हैं न अगर इसे शादी कहते हैं तो होगई है...."
इस अप्रत्यासित उतर की मुझे आशा नही थी  .....
मैं सोच में पड़ गई कि मैं क्या कहूँ ...मेरे  इस उधेड़बुन की अप्रत्याशित चुप्पी देख कर  वो  स्वतः हँस पड़ी ....
देवकी ने पुनः कहना शुरू किया  "मेरी शादी के चार वर्ष कल पूरे हो गए दी ..., बैठिये न आप पहली बार मेरे रूम में आई हैं ,परन्तु आप प्रथम दिन से ही मुझे अच्छी लगती हो,आप न जाने क्यों मुझे अन्य लड़कियों से भिन्न दिखती हो ...." यह कहकर वो चुप हो गई।
         फिर इधर उधर की कुछ बाते हुईं..
 उस आत्मीयता के क्षण में लगा हम एक दूसरे को  अरसे से जानते हैं। उसको सबसे मिलते जुलते रहने की हिदायत देती हुई मैं अपने रूम में आगई।

         परन्तु उस दिन मेरा मन  पढ़ाई में नही लगा .....
बार - बार देवकी का मासूम चेहरा आ जाता और मैं उसके उत्तर को जितना सुलझाने का प्रयत्न करती उतनी ही उसकी गांठे मजबूत हो जाती.......
 उस अनसुलझी गांठ को खोलने के प्रयास में एक सिरा पकड़ती तो दूसरा छूट जाता  अंततः उसी उधेड़बुन में जाने कब निद्रा ने मुझे अपने मधुर आगोश में ले लिया। दिन बीतते रहे हम मिलते पर उस विषय पर कोई बात नही होती या यूँ कहें कि उसके मासूम पश्न का उत्तर मेरे पास नही था।
            फाइनल परीक्षा हुई  परीक्षा देकर जब मैं रूम में आई तो मेरी रूमेट ने बताया की देवकी आई थी और उसने मुझे बुलाया था। दूसरे दिन मेरा आखिरी पेपर था देकर मैं सीधे उसके कमरे में गई ,मुझे देख कर खुश हुई परन्तु डबडबाई आंखों से कह बैठी --ऐसा क्यों होता है जिसे मैं चाहती हूँ वही मुझसे दूर हो जाता है।पहले मां फिर पिताजी और बड़े भाई भाभी का स्नेह अनुराग न जाने कहाँ उड़ कर विलीन होगया। शादी हुई राजकुमार अमेरिका से ब्याहने आया दो दिन साथ रहा गौना की रश्म कर लेजाने का वादा करके जो गया तो पलट कर फिर नही आया । उसके मां बाप मुझे काम करवाने के लिए लेजाना चाहते थे परन्तु मेरे मामा ने नही जाने दिया और मेरा नाम यहां लिखवा दिया।बस मांग में चुटकी भर सिंदूर की सजा भोग रही हूँ।
            एक सांस में ही सारी बातें  वो कह गई  .....मै स्तब्ध,किंकर्तब्यविमूढ़ सी खड़ी रही..... क्या उत्तर देती !बस उसे गले से लगा लिया..... लगता था की वर्षों का रोका हुआ आसुओं का बांध टूट गया हो थोड़ी देर के बाद शांत हुई .....
 और नीचे सिर किये हुए ही कहा उसने "आज तक के मेरे जीवन की यही कहानी है। "
              अगले अंक में    .........              
                     
                                            उर्मिला सिंह
                 
                       
                        
                       
                        
                                     

Sunday, 10 May 2020

माँ.....

माँ तो सांसों में जीवन के हर पल में होती
माँ का कोई मुख्य दिन भी होता है ,
ये तो अता पता ही नही था मुझको....
हर दिन हमको तो माँ का दिन लगता है ।

उनके चरण स्पर्स जब जब करते थे ,
दुवाओं के पुष्प सदा हम पर गिरते थे
माँ के ममतामयी हथेलियों का स्पर्श
आज भी मन पल-पल अनुभव  करता  हैं ।
यादों के दिव्य कोष में माँ नाम अमर रहता है

उनकी मीठी-मीठी झिड़कियां सुनने को ,
आज भी  कान हमारे तरसा करते हैं ।
उनके हाथो के पकवानों की खुशबू  को.. 
अब उनकी यादों में हम ढूँढा करते है ।

माँ के पास थी नही  डिग्रियां कोई  
पर उनसा शिक्षक मिला न कोई  ।
तीन बच्चों की माँ हूँ,पर आदर्श उन्ही का-
बच्चों को,जीवन में सिखालाती  आई !

माँ में रामायण गीता , माँ में तुलसी माला,
माँ के चरणों में हरिद्वार,काशी और मथुरा !
माँ ममता की सागर , माँ  में ही परम् मोक्ष ,
चरणों में नतमस्तक रहेगा सर्वदा मन मेरा

यह सच है तुम देती नही मुझे दिखाई -पर
तेरे दिए संस्कार जिंदा हैं मुझमें आज भी
शाम को देहरी पर दीपक जलाना याद सदा रहता
तेरे पार्थना के स्वर गूँजते 'माँ' कानों में आज भी।।
         ******0******0*****
                           उर्मिला सिंह
        

Saturday, 2 May 2020

उम्र जाते जाते....

उम्र जाते जाते .....
***************
जिन्दगी! पतंग की तरह अम्बर में  उड़ जाने दे
उमंगो की स्वर  लहरी हवाओं  में बिखर जाने दे!       

तिमिर आच्छादित न हो  भावों को जरा महकने दे
कल  किसने देखा हँस के जिन्दगी गुजर जाने दे! .

जिन्दगी जीने की कसक रह न जाये कोई बाकी
रातरानी के फूलों से आज अंचल  भर जाने दे !  

बिछा के पलकों के  जाल कैद करलूँ उसको
उसके अधरों की मुस्कान संगीत बन जाने दे  !  

सिहर उठती है उर सरिता दिनकर छवि देख कर
नव प्रभात भरता उजास किरण संग मचल जाने दे!
     
                                                 #उर्मिल



                          
     
                        
                              ...
                              के
  

शोहरत पर मत कर अभिमान

शोहरत की मदिरा पर 
मत कर इतना गुमान रे इंसान
मत कर इतना अभिमान !

 है ये चार दिनों का खेला 
आज है कल मिट जाए रें इंसांन
मत कर इतना अभिमान !

महल अटारी ढह जायेंगे 
सत्कर्मों का लेखा जोखा ही नाम तेरा फैलाएगे 
माया लोभ के वस मैं आकर 
नफ़रत के जाल क्यों फैलाये रे इंसान,
मत कर इतना अभिमान !

जब छाये रात घनेरी ,
जब सूझे ना पथ दूजा कोई 
अंतर्मन का दीप तेरा राह दिखाए रे इन्सान,
मत कर इतना अभिमान !

परोपकारी के राहों में काटें 
बन पुष्प बिखर जाएं रे इंसान ,
मत कर इतना अभिमान !

 श्रेष्ठ वही जीवन जो 
 औरों के दुख दर्द में 
 करुणासिक्त बन बांह गहे रे इंसान 
  मत कर इतना अभिमान !

 मन मंथन कर सोच जरा 
 मानव निर्मम बन भवसागर
  कैसे पार करे रे इंसान ....
 मत कर इतना अभिमान।
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                                   उर्मिला सिंह
 
 
 
 
 
 
 
 
 






Friday, 1 May 2020

मजदूर

मैं एक मजदूर हूँ
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परिश्रम का पसीना बहाता
उसीसे दो वक्त की 
रोटी का जुगाड़ करता
माँ भारती का लाडला पुत्र 
     एक मजदूर हूँ!!

 बारिष ठंढ और धूप में 
 तपकर सोना होगया हूं 
 फिर भी बड़े लोगों का--
 ज़ुल्म सहता ,किस्मत का मारा
       एक मजदूर हूँ!!
       
बड़े -बड़े महलों में रहने वालों
हमारी हस्ती को भूलने वालों
हमारे पसीनों की बूदें नीव है -
तुम्हारे आलीशान महलों की।
फिर भी अपमानित किया जाता ,क्यों कि  
            एक मजदूर हूँ!!
        
पुलो सड़कों पर दौडतीं रेलगाड़ियां
मजदूरों के परिश्रम की हैं निशानियां
बेबसी,मज़बूरियों में उलझी रहती जिंदगानी 
परिश्रम का नेवाला खाता  खिलाता....

              एक मजदूर हूँ!!
             
                     उर्मिला सिंह,