अजीब दुनिया,अजीब लोग हो गए,जो बड़े थे वो आज छोटे हो गए।रिश्ते परिंदे बन उड़ चले.....हम सहमें- सहमें देखते रह गए।रफ़्तार- ए जिन्दगी इस कदर तेज हो गई,जो आगे चल रहे थे वो पीछे हों गए। जिंदगी के सफ़र मेंअकेले रह गए....टूटते..बिखरते..सम्हलते रहगए। स्वार्थी दुनिया केभ्रम में जीते रहे...उम्मीदों का जनाजा,धूम धाम धाम से देखते रह गए। उर्मिला सिंह
आप आज की दुनिया की सच्चाई बिना घुमाव के कह देते हैं। रिश्तों का परिंदे बनकर उड़ जाना बहुत सटीक बिंब है। मैं पढ़ते हुए खुद को कई पंक्तियों में खड़ा पाता हूँ। समय की रफ्तार, बदलते लोग और अकेलापन आपने ईमानदारी से रखा है। शब्द भारी नहीं लगते, भाव खुद बोलते हैं। टूटना, बिखरना और फिर संभलना, यही तो हमारी रोज़ की कहानी है।
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