बचपन की यादें उम्र की झुर्रियों तले छुप गई
हम देखते रहें जिन्दगी अपना वजीर चल गई
गिरती दीवारों को सम्हालता कौन है
कँपकपाते हाँथो कोें थामता कौन है
जिन्दगी अच्छी गुजरी,किश्मत की बात है
दर्द में जो गुजरी साहिब कर्मों की बात है!
ठीक कहा आपने
हार्दिक धन्यवाद मान्यवर
ठीक कहा आपने
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद मान्यवर
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