Saturday 18 March 2017

नारी


कविता

मै विधाता की रचना ,सशक्त नारी हूँ;

करुणा ममता क्षमा अंचल में पलते मेरे;
मैं भीरु नही  रण चण्डी  दुर्गा  काली हूँ !

है  विद्या  बुद्धि , सरस्वती  का  वरदान मुझे;
पुरुषों के समक्ष खड़े रहने का आधीकर मुझे!

अगणित सीमाओं में बंधी खुद की राह बनाया;
आत्मबल साहस से ये मुकाम पाया हमने!

कितनी गाँठे खोली कितनी जंजीरे तोड़ी है;
संघर्षो से जूझते हर धर्म  है  निभाया हमने!

दिल का दर्द छुपा ,घूट पिया अश्कों का है;
आन पे जब आँच पड़ी शमशीर निकाला हमने!

समुन्दर जैसी खारी ,पर पावन गंगा जल मै हूँ ;
पति की  अंकशायनी  पर सहचरी  भी  मैं हूँ !

दहेज की बलि वेदी पे उत्सर्ग करूँ स्वयं को;
इतनी लाचार नही,नव युग की शक्ति,चण्डी मै हूँ!

                                        #उर्मिल#



6 comments:

  1. दहेज की बलि वेदी पे उत्सर्ग करूँ स्वयं को;
    इतनी लाचार नही,नव युग की शक्ति,चण्डी मै हूँ!वाह!!! आदरणीय उर्मिला जी सचमुच शक्तिरूपा नारी अपनी बहुत सी समस्याएं खुद ही हल कर पाने में सर्वांग सक्षम है | बहुत प्यारा जयघोष !!!!!!! सादर शुभकामनाएं

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    1. स्नेहिल धन्यवाद प्रिय रेणू।

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    2. धन्यवाद प्रिय रेनू।

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  2. दी ब्लॉग पर आपका स्वागत,
    सशक्त रचना नारी सशक्तिकरण का आह्वान करती।

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  3. आज पञ्च लिंक पर सजी रचना को फिर से पढ़कर अच्छा लगा उर्मि दीदी | बधाई स्वीकार करें | सादर

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