Monday, 14 December 2020

सांस की सरगम

सास की सरगम पर गीत है जिन्दगी की 
बज रही है धुन कभी खुशी कभी गम की! 

मायूसियों से घबड़ाना क्यों ,कांटों से डरना क्या 
खोज वो ठिकाना जहाँ चिंता न हो गम की! 

अजनबी से ख्वाब मेरे  हँस रहे आज मुझ पर 
क्या पता था उजालों में छांव मिलेगी ग़म की! 

जिन्दगी देके भी नहीं चुकते जिन्दगी के कर्ज कुछ 
पर वक्त बैठा कर रहा इशारा सुरमई मंद की ! 

है न अज़ीब सी बात इस मुई जिन्दगी की..... 
अश्क आँखों में अधर पे गान जिन्दगी के नज़्म की!! 
                 *******0*******
                 उर्मिला सिंह





8 comments:

  1. सुंदर भावों का संयोजन। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीया

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    1. हार्दिक धन्यवाद पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा जी।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (16-12-2020) को "हाड़ कँपाता शीत"  (चर्चा अंक-3917)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी हमारी रचना को शामिल करने के लिए।

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  3. है न अज़ीब सी बात इस मुई जिन्दगी की.....
    अश्क आँखों में अधर पे गान जिन्दगी के नज़्म की!!

    सुन्दर सृजन....

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    1. विकाश नेंनवाल जी ह्रदय से आभार।

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    1. मनोज कायल जी उत्साह वर्धन के लिए आभार।

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