Sunday, 15 May 2022

गुन गुनाओं ज़रा

गुनगुनाओ की  सहरा में भी बहांर  आजाये।
सुर  सजाओ  फिजाओं में भी जान आजाये।।

बड़ी बेरुखी से देखा है  जिन्दगी ने मुझे।
ज़रा शम्-ए उल्फ़त जलाओ तो चैन आजाये।।

बेज़ार अनमने से चल पड़े सफ़र पर।
हाथों में हाथ ले रोको मुझे तो करार आजाये।।

सुनी डगर सुनी निगाहें सुनसान हैं वादियाँ ।
निगाहे करम हो तेरी तो साँसों में जान आजाये।।

बिखरते ख़्वाबों की सिसकियां दूर तक गूँजती।
बिखरे ख्वाबों को सजा दो तो निखार आजाये।।

            उर्मिला सिंह
















11 comments:

  1. बिखरते ख़्वाबों की सिसकियां दूर तक गूँजती।
    बिखरे ख्वाबों को सजा दो तो निखार आजाये।।
    ..सुंदर अहसास से निकली उत्कृष्ट रचना।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जिज्ञासा जी।

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    1. उत्साहवर्धन के लिए आभार आलोक सिन्हा जी

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  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज मंगलवार (17-5-22) को "देश के रखवाले" (चर्चा अंक 4433) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

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    1. हार्दिक धन्यवाद कामिनी जी हमारी रचना को चर्चा मंच पर रखने के लिए।

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  4. बहुत बढ़िया सृजन 👌

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  5. वाह!दी अलग ही अंदाज कहीं श्रृंगार लगता है कहीं उस मालिक से अर्ज करते शेर।
    अहा!!
    सुंदर।

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  6. धन्यवाद प्रिय कुसुम

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