*बन्दे मातरम्*
धरती की मौन व्यथा समझे कौन...
सूरज की मौन लिपी समझे कौन....
जो बाट रहे खण्ड-खण्ड में देश को
ऐसे गद्दारों को देश प्रेम समझाएं कौन!
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केंचुल-सा आवरण हटा...
भ्र्ष्टाचारी सब एक हुए
इसी प्रेम ने सबको आलिंगनबद्ध किये...
राजनीती का स्तर गिरा, हो रहा तांडव नृत्य...
जाल झूठ का बुनते हुए
कर रहे हैं ये कुकृत्य!
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विषधारी तेरे फन से सत्य का आस्तित्व बड़ा ...
झूठ की ज्वाला में तेरे पूर्वजों का आदर्श जल रहा....
असत्य इतना न उछाल कि पराजय बन जाय तेरी...
जला सके प्रहलाद को
कोई जग में ऐसा ताप नही...।
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कर्म तुम्हारा जनता सब जानती है....
तुम कितने पानी में हो जनता पहचानती है...
झूठ कीआंधी ज्यादा दिन टिकती नही...
मकसद तो केवल तुम सबका सत्ता पाना है!
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देश के दुश्मनो ,सावधान जनता सब जानती ..है !
हर तीर तुम्हारा सत्य से टकरा
वापस तेरे पास ही जायेगा...
क्योंकी.......
जनता षडयंत्र तुम्हारा सब जानती है.....।
उर्मिला सिंह
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