नवरस
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नवरस संचित होते मन में
स्फुरण होते भावों के
सुरभित शब्द हार बनते उससे
नव रस बिखरने लगते ।
उर से भाव निकलते जब
कलम सजग हो जाती
पन्ने शब्दों की अगवानी करते
सरस् सरिल सरिता बहती जाती।
विविध भाव अंकुरित पन्नो पर
ममता की दरिया बहती
डोरे डालते भ्रमर कलियों पर
कभी दुश्मन पर तलवार निकलती ।
सजती बारात कभी तारों की
चाँद कभी आंगन मुस्काता
दिग दिगांत सुरभित हो इठलाता
दृग से अनुराग छलकता
शब्द पंखुरी पन्नों पर झरती ।
मन की पीड़ा अधर तक पहुंचती
ह्रदय वेदना से चीख निकलती
पन्ने मुखर , कलम संवाद बनाते
मसि मोती सम चमकती
नवरस भाव गुंजित कविता सजती।
उर्मिला सिंह