Friday, 3 May 2019

गरीबों की दास्तां......


गरीबों की दास्तां
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गरीबों की ....जिन्दगी में ,
सपनो की...... चिताएं जलती हैं!
पिघलते दर्द वेदना के .....
ज्वार भाटा सी ......कसक उठती है!
ऊँचे महलों में .....रहने वालों को,
होश रहता नही .....झोपड़ियों का
दब के रह जाती .....सिसकियां
सुनने वाला कोई .... रहता नही है!
इसी हाल में जीते....... ,
इसी हाल में मर जाते......'
सियासत खूब होती है......
लुभावने वादे खूब होते हैं......।
जरूरत वोट की पूरी होते ही...
पानी के बुलबुले से बह जाते हैं।।
           ****0****
                                  ऊर्मिला सिंह

नव युग की नारी.....

नव युग की नारी.....
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प्यार समर्पण निष्ठा को खुली चुनोतिें अब देने दो
सड़े गले रीत रिवाजों का अंत हमें अब करने दो !!

         मंजिल के पथ पर कदम बढ़ाने दो
         जख्मों का दर्द मलहम बन जाने दो
         जिन्दगी से आँख चुराया हमने पल पल
         ख्वाबों की बारात का बुझते दिये जलाने दो

 नव  युग  की नारी है पँखो  में उड़ान  भरने दो!
सदियों बाद खुली हवा में खुल के सांस लेने  दो!!

       अभी कुहरे को कुछ और छटने दो!
       अम्बर में कुछ तेज रोशनी होने दो!!
       अभी तो जंजीरों को खोले हैं हमने!
       विस्तृत गगन को जरा तो तौलने दो!!

नव युग की नारी नव आसमाँ में उड़ान भरने दो!
सदियों बाद खुली हवा में खुल के साँस लेने दो!

      लगाये घात अनेको यहाँ बाज बैठे हैं !
      उनसे बचने के पैतरे भी सीखने दो!!
      पर कतरने को तैयार जल्लाद बैठे  हैं
      उन्हें सीख देने को खड्ग हाथ लेने दो
  

नव युग की नारी नव आसमाँ में उड़ान भरने दो!
सदियों बाद खुली हवा में खुल के साँस लेने दो!

     समाज की अवहेलना सह जीते रहे सदा
     व्यंग वाणों से ह्रदय छलनी होता रहा सदा
     कलियाँ मसलती रही अहम हँसता रहा सदा!
     अहम की गूंज का हथियार हाथों में लेने दो !!

नव युग कि नारी नव आसमाँ में उड़ान भरने दो!
सदियों बाद खुली हवा में खुल के साँस लेने दो!
      
         ऋचाएं काव्य सभी आज झूठे हो गये!
         ‎तुलसी कालिदास जैसे भाव लुप्त हो गए!!
         ‎हमें सीख मत  दो सीता और राधा की!
         ‎हमें विरांगना बन जीने का आशीर्वाद दो!!

नव युग की नारी नव आसमाँ में उड़ान भरने दो!
सदियों बाद खुली  हवा में खुल के साँस लेने दो ! 

          ऊँच नीच धर्म की राज नीत करतें हैं सभी!
          ‎बलात्कार रेप धर्म की नही, नारी की होती!!
          कानून पुलिस सियासत सभी ख़ामोश होते!
          इन्हें  सबक सिखाने का हौसला भरने दो !!

    नव युग की नारी नव आसमाँ में उड़ान भरने दो!
    सदियों बाद खुली हवा में खुल के साँस लेने दो!
           ‎                                   
           ‎                                         #उर्मिला
           ‎
           ‎
          ‎      ‎
         ‎

Tuesday, 30 April 2019

न हम सफ़र न हमनशीं होगा कोई तेरा,प्रण तेरा है तुझे ही पूरा करना होगा

जन जन की आवाज......
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नीद कहाँ उन आंखों में जो देश भक्ति का मतवाला हैं
विजय तृषा बढ़ती  जाती  देख के पाँवों  का छाला हैं!

सुकून नही उसको तबतक अरि  दहन न हो जबतक
उर में दाह कण्ठ में ज्वाला नित आगे बढ़ता जाता है !!

एक लक्ष्य है एक सफर एक ही मंजिल है उसकी
माँ भारती का शीश न झुकने दूंगा मन में ठाना है!!

सत्य का उज्ज्वल शंख उठा कर रहा हुँकार चतुर्दिक
तीर चुभें है तन मन में फिर भी शेर गर्जता जाता है

शक्ति विचारों की जीवन में सुख का नाम नही,
देश का यह वीर सपूत महा गठबंधन पर भारी है!!
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              🌷 उर्मिला सिंह

Monday, 29 April 2019

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,हम बुल बुले हैं......


सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा हम बुलबुले हैं इसके........
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चतुर्दिक काँव काँव की आवाजें है देती सुनाई
कहीं  बुलबुल की आवाजें  है देती नही सुनाई
अभद्र वक्तव्यों सेे खुद को साबित करते हैं बलशाली
जनसेवा का ढोंग रचते भरते हैं जेब अपनी खाली!!
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                        🌷उर्मिला सिंह

Sunday, 28 April 2019

मौसम का चरखा......

मौसम का चरखा.....
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मौसम का चरखा ऐसा बनाया भगवान ने ,
पतझर है तो मधुमास भी  मुस्कुराना चाहिये !!

एकरंगी जिन्दगी रसहीन हो जाती है साथियों
तपती धरा पर घटाओं के प्रीत की बौछार होना चाहिये!!

फैलातें हैं जो नफ़रत का धुवां इस जमीन पर
अंतर्मन में उनके मोहब्बत की शमा जलाना चाहिये!

गुल कर दिया ख्वाब  हमने सारे
चाँद तारों को भी नीद आना चाहिये!!

प्रेम,करुणा से छलकते मर्म, मन के आंगन में,
श्रमभाव से पूरित लोकगीतों का, मधुर संगीत होना चाहिये!

दिन गुज़रता है  बेवज़ह रात गुजर जाती है,
शनैः शनै: जिन्दगी को खुद से निजात मिलना चाहिये!!
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                   ।🌷उर्मिला सिंह

Saturday, 27 April 2019

तन्हाईयाँ....

जब से तन्हाइयों में जीने का सलीका आगया ,
तब से खुद को पहचानने का तरीका आगया!!

खामोश लबों की भी अपनी कहानी होती है
जिन्दगी जीने कि येअदा भी निराली होती है!

                🌷उर्मिला सिंह

Sunday, 21 April 2019

सांसों के दीपों को जलते बुझते देखा है......

साँसों के दीपों को जलते-बुझते देखा है...

         मृद सपनों को हमनें मरते देखा है,
         अरमानों को यहाँ  तड़पते देखा है
         सुख की अंजुरी में........
         वेदना  के अंकुर पनपते  देखा  है!
        
     साँसों के दीपों को जलते-बुझते देखा है...

        आशा में भ्रमित मन को जीते देखा है,
        मन को चंदा सा शीतल बनते देखा है
        छटते तम,खिलती आभा की चाहों में
        पल - पल   रातों  को  मरते  देखा  है!

    साँसों के दीपों को जलते - बुझते देखा है....

        नयन  घट  छल करते रहे सदा ,
        विरही मन सुलगता ही रहा सदा
        प्रीत परीक्षा कब होगी पूरी,जानूँ ना
        क्लान्त देह, सिसकते मन को हँसते देखा है!

   मैंने साँसों के दीपों को जलते - बुझते देखा है....
       
                                             🌷 उर्मिला सिंह