Friday, 20 November 2020

कली आत्मा भौरें. ...

कली  आत्मा भौरें  दुर्गुण तन है माया जाल
जीवन तृष्णा में उलझा भटक रहा मन बेहाल।।

अंधेरा बहुरूपिया ,(कोरोना)आये धर कर बहुरूप
आशा विजयी,झिलमिलाई धर दीपक का रूप।।

श्वेतशुभ्र-शरद,और बसन्त दोनों देता है शुभ संदेश
दोनों आनन्द के पर्याय हैं दोनों के अलग अलग संदेश

बसन्त,उल्लास बिखेरता स्थाई भाव रति का है द्योतक
शरद,शान्त श्वेत कपोल सम आंतरिक समृद्धि का द्योतक

फूलो को चुनतें हैं जैसे शब्दों को उसी तरह चुनना है
गीत ग़ज़ल कविता के भांवो में सोच समझ कर गूँथना है।।

          उर्मिला सिंह











 

Thursday, 5 November 2020

जो मिला नही उसका कुछ गिला नही.......




वो दर्द जो गया नही वो जज़्बात जो कहा नही
नीर आंखों से झरते रहे विकल मन कुछ कहा नही।।

जो  मिला नही मुझे उसका कुछ गिला नही,
उम्मीदों की लौ बुझी नही हौसलों ने हार माना नही।।


नफ़रतों की बह रही बयार प्रदूषणो से कराहती धरती 
 फैलते ज़हर से तन मन बचा नही कोई जाना नही।।

ज़रा ठहरो -सहरे-चमन में सांप फन उठाएं बैठे हैं 
किस किस को कुचलोगे अभी तक तो तुमने समझा नही।।

 कभी झाँक कर ह्रदय स्वयम से पूछते क्यों नही
 बिखरे नागफनी को राहों से हटाना तुम्हे आता नही।।

अंधियारी रात को समेटने दीप्त रोशनी ले दीपावली आई
ह्रदय का दीपक जलाओ खुशियां ढूढना तुम्हे आता नही।।
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                        उर्मिला सिंह










Tuesday, 3 November 2020

दुनिया का चलन....

सीखने लगे सबक
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दुनिया का चलन 
लगे सीखने सबक
बहुत नादान थे हम 
समझ न पाए सबब।

छल प्रपंच से भरी
है ये दुनिया सारी
देखी जो बेहाली
नम हुईं आंखे हमारी।

'पैरों तले खिसकने
लगी जमीन'
हम सम्भलने लगे 
रफ्ता-रफ्ता बढ़ने लगे।

थक कर बैठे न हम
पांव जख्मी हुवे
अश्क ढुरते रहे
मलहम को तरसते हम।

दुनिया की हकीकत 
रिश्तों की गठरी खुली
उघड़ी तुरपाई की मरम्मत हुई
 जिन्दगी आहिस्ता आहिस्ता
 कांटों में  खिलने लगी।।

      उर्मिला सिंह

Wednesday, 28 October 2020

नारी अस्मिता पर चोट कब तक?

नारी अस्मिता पर चोट कब तक???
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    जीवन उपवन इतना सूना क्यों है
    राहों  पर  इतना  सन्नाटा  क्यों है
    सहमी सहमी डरी डरी कलियां  ....
    उजालो के घर अँधेरा  क्यों है।।

    जिस देश में कन्या पूजी जाती है
    नारी गृहलक्ष्मी की उपाधि पाती है
    जहाँ  गंगा के सम  सकल वश्व में जल नही
    वहां नरभक्षी दैत्यों से अपमानित होती है।।

कागज के पन्नों पर कानून लिखे रह जाते हैं
नेताओं के वादे वोटों तक सीमित रह जातें हैं
सहन शक्ति की भी सींमा होती है नेताओं सुन लो
जनता न्याय करेगी जब रोक नही पाओगे सुन लो।।

हर धर्म हर पार्टी नारी सुरक्षा की बातें करती है
फिर कथनी करनी में फर्क भला क्यों करती है
इंसानियत,नैतिकता का पाठ क्या तुमने पढ़ा नही
समस्त नारी आज आप सभी से पश्न यही करती है।।
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                उर्मिला सिंह
 




Sunday, 25 October 2020

गज़ल

तूफानों में जो जल सके वो चिराग लाओ
हरसू अंधेरा ही अंधेरा  है उजाले लाओ !!

मजहब के छालों से जख़्मी तन मन होरहा
हो सके तो मोहब्बत के भरे  प्याले लाओ!!

शब्दो के बाण चल रहे दिल के टुकड़े हो रहे
 प्यार से ,मौन  हुवे होठों  की  आवाजें  लाओ !!

 भरम पाले  बैठें  हैं  ख़ुशबुओं  को कैद करने का
 ‎दिले -गुलशन में हुनर खुशबू फैलाने  के लाओ!!

इश्क मोहब्बत की चर्चा लिखने में मशगूल रहे
भूख से तरसते बचपन को रोटी के निवाले लाओ।

महलों  के साज सज्जा के दीवाने तो सभी होते
पानी से भींगती जिन्दगी के लिए ठिकाने लाओ।।
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                 उर्मिला सिंह


 
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Wednesday, 21 October 2020

शक्ति पुंज हो ,शक्ति का आवाह्न करो...

द्रोपदी  का चीर  हरण  नित्य होता रहा 
  दर्द की कराह रौंद जग आगे बढ़ता रहा
  राजनीति सियासत का पासा फेकती रही.....
  उसूल मरता,न्यायालय जमानत देता रहा ।।
 
 
कलमकार का दर्द पन्नों पर बिखरता रहा
 चरित्र का खुले बाज़ार में सट्टा चलता रहा
कलयुगी रावणों की जमात में राम खोगये कहीं....
 आज का कायर इंसान गूंगा बहरा हो रहा ।।
  

 नारी  पुनः शक्ति  अपनी तुम्हे पहचानना होगा
 आखिरी सांस तक अधर्मियों के संग लड़ना होगा
 तुम्हे इन दुर्गंधित कीड़ों को मारकर ही मरना होगा
 यही संकल्प नवरात्रि में हर नारी को लेना होगा।।


 चुनौती बन के आओ इन दम्भीयों के सामने
 यह लड़ाई होगी तुम्हारी  इन आतताइयों से
 शक्ति पुंज हो  शक्ति का आवाहन करो..
 प्राणों की भीख मांगेंगे ये गिद्ध तुम्हारे सामने।।

                              उर्मिला सिंह
 

 

Monday, 19 October 2020

जो कभी नही भरते.....

माने या न माने.....चार स्थान ऐसे हैं जो कभी नही भरते 
समुद्र, मन, तृष्णा, और श्मशान 

समुद्र :-

समुन्दर तेरी गहराई तेरे ओर क्षोर का पता नही
कभी खाली नही दिखता,नजाने कितनी नदियों से मिलता
क्या क्या छुपा रक्खाअंतस्तल में कुछ पता नही मिलता
जो जितने गहरे डुबकी लगाते उतने ही रत्न जुटाते
तभी तो दुनिया में तुम रत्नाकर कहलाते।।

मन:-
सागर के छोटे भाई लगते तुम
भाओं के अम्बार छुपा रक्खे तुम
कुछ संकुचित कुछ विस्तीर्ण होते
तेरी गति से तेज न गति होती किसीकी
अभिलाषाओं से खाली मन होता नही कभी।

तृष्णा:-

मानव काया तृष्णा के चेरी 
प्यास कभी न बुझ पाई इसकी
जाने कितना गहरा पेट है इसका
भरने का यह नाम न लेती.......
तभी तो कहते हैं"तृष्णा तूँ न गई मन से"


श्मशान:-

जीवन का सत्य यहीं से दिखता
अग्नि की लपटों का घिरा रहता
कभी न बुझती आग तुम्हारी.....
किसने तुझको है ये श्राप दिया।।

      उर्मिला सिंह