चलन दुनिया का
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दुनिया का चलन
लगे सीखने सबक
बहुत नादान थे हम
समझ न पाये सबब।
छल प्रपंच से भरी
ये दुनिया सारी
देखी जो बेहाली
नम हुईं आंखे हमारी।
'पैरों तले खिसकने
लगी जमीन'
हम सम्भलने लगे
रफ्ता-रफ्ता बढ़ने लगे।
थक कर बैठे न हम
पांव जख्मी हुवे
अश्क ढुरते रहे
मलहम को तरसते हम।
दुनिया की हकीकत
रिश्तों की गठरी खुली
उघड़ी तुरपाई की मरम्मत हुई
जिन्दगी आहिस्ता आहिस्ता
कांटों में खिलने लगी।।
उर्मिला सिंह
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 1 जुलाई 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
पम्मी जी हार्दिक आभार आपका।
Deleteसुंदर
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका।
Deleteदिल की गहराई से निकली हुई अभिव्यक्ति है यह
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद मान्यवर
Deleteपैरों तले खिसकने
ReplyDeleteलगी जमीन
सुन्दर रचना 😃
हार्दिक धन्यवाद मान्यवर
Deleteबहुत सुंदर रचना
ReplyDeleteहार्दिक आभार हरीश कुमार जी
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