प्रार्थना का मूल रूप.....
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प्रार्थना जितनी गहरी होगी
उतनी ही निःशब्द होगी
कहना चाहोगे बहुत कुछ
कह ना पाओगे कभी कुछ।
विह्वल मन होठों को सी देंगे
अश्रु आंखों के सब कह देंगे
संवाद नही मौन चाहिए .....
प्रभु मौन की भाषा समझ लेंगे।।
💐💐💐💐
प्रार्थना का मूल रूप.....
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प्रार्थना जितनी गहरी होगी
उतनी ही निःशब्द होगी
कहना चाहोगे बहुत कुछ
कह ना पाओगे कभी कुछ।
विह्वल मन होठों को सी देंगे
अश्रु आंखों के सब कह देंगे
संवाद नही मौन चाहिए .....
प्रभु मौन की भाषा समझ लेंगे।।
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वक्त तेरी राहों पे चलते चलते उम्र ढल जाती है
बिन जिए ये जिन्दगी जाने कैसे गुजर जाती है।।
न शिकवा न शिकायत खामोशियों का अlलम है
वक्त की मेहरबानियों के आगे जिंदगी हार जाती है।
कहां से चले थे कहां पहुंचे गए हम पता नहीं
सुरभित सांसें आज वेदना के स्वर में खो जाती हैं।
मिट मिट कर जीवन मूल्य चुकाएं हैं नश्वर जग में
वक्त वेदी पर,अश्रु,लहरों के अर्घ्य चढ़ाने आती है।
जीवन के प्रश्नोत्तर समाप्त सभी हो जाते है.....
जब आशाएं बिन मंजिल पाए अदृश्य हो जाती हैं।
🌷उर्मिला सिंह🌷
हृदय में क्रंदन उर ज्वाला,जीवन गीत लिखूं कैसे
अश्कों के सजल रथ ,मोम से ख्वाब पिघलते
व्यथा की पीर दिशाओं में हवाओं के संग भटकते
बिखरे स्वप्न फूलों के,मन अंचल में छुपाऊं कैसे?
हृदय में क्रंदन उर ज्वाला,जीवन गीत लिखूं कैसे
भावों के गीत मनोरम सब जीवन से लुप्त हुए
आहों की सरगम में जीवन के दिन रात व्यतीत हुए।
आरोह,अवरोह,पकड़ सब भूल गया विकल मन
भव सागर के लहरों से जीवन नैया पार करूं कैसे।
हृदय क्रंदन उर ज्वाला जीवन गीत लिखूं कैसे...
स्वर खोया शून्य में,अग्नि में समर्पित तन
उड़ती चिंगारियों के बाद बचेगी थोड़ी भस्म
सजल दृगो की करुण कहानी..गंगा में प्रवाहित
वेदना कणों की समर्पण के गीत लिखूं कैसे।
हृदय क्रंदन उर ज्वाला जीवन गीत लिखूं कैसे....।
उर्मिला सिंह
धूप...
कभी धूप मिले कभी छांव मिले
कभी फूल मिले कभी शूल मिले
पांव चलते ही रहे चलते ही रहे...
पावों से शिकायत छालों ने किया...
अश्कों की दो बूंद गिरी......
दिल ने हँस के कहा ये......
सहते ही रहो ये जीवन है
यहां भोर भी होती है
तिम भी आक्छादित होता है
गुनगुनी धूप, छांव और फूल भी हंसते हैं
मुस्कान भी है गान भी है
बस कर्मों का खज़ाना है सब तेरे
स्वीकार करो,प्रभु नाम जपो
मुक्ति का बस यही द्वार है तेरे।।
उर्मिला सिंह
दर्दोगम को दिल में छुपाये रखती है
कई ख्वाब आँखों में सजाये रखती है
जिन्दगी को तपिश की लपटों से बचाती हुई
नारी पहेली बनी कर्तव्य पर उत्सर्ग रहती है !!
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#उर्मिल
सुलझाने से भी न सुलझे वो ज़िन्दगी है
समझ समझ के भी न समझे ऐसी पहेली है
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# उर्मिल